शनिवार, 27 फ़रवरी 2010

व्‍यंग्‍य: होरी की वेदना ..;; रंग के बादर फट गये - नरेन्‍द्र सिंह तोमर ‘’आनन्‍द’’

व्‍यंग्‍य: होरी की वेदना ..;; रंग के बादर फट गये

नरेन्‍द्र सिंह तोमर ''आनन्‍द''

होरी की हुरियारी में छायी मस्‍ती चारों ओर ।

छायी मस्‍ती चारों ओर मगर कछु दुबके फिरते ।।

लिये हाथ में रंग सफेदा, भरें अबीर, गुलाल चहकते ।

भरें अबीर गुलाल चहकते, मगर कछु बिल में घुसते ।।

बिलवाले दिलवाले से होरी वारे कह रहे ।

काहे बिल में दिल घुसा, सब चिन्‍ता कर रहे ।।

कब तक बिल में घुसे पड़े दिल की खैर मनाओगे ।

बिन धड़कन के दिल बिल की कब तक आह छुपाओगे ।।

कोई चोर डकैत आवेगा बिल खोद खाद ले जायेगा ।

दिल चोरी हो या लुट जावे कोई रोज रात को आयेगा ।।

कब तक जाग जाग ऑंखों में पहरेदारी कर पाओगे ।

कब तक चोरी चोरी आ आ कर नजर निगाही कर पाओगे ।।

इक सलाह हुरियारे दे रहे बात बता कर खास ।

छिप्‍पन और छिपावन कर दिल बचने की ना आस ।।

गर दिलवाले बिल में घुसकर दिल जो बचाते ।

तो सब दिलवाले अब तक बिल में घुस जाते ।।

इक मिला था लवली स्‍वीट था, दिल का बस ये रोना है ।

अब चला गया तो चला गया, तेरे छिपने सा का होना है ।।

कौन ले गया लेने वाला, ले गया जो ले गया ।

ले गया कैसे गया, अब गया चला तो चला गया ।।

क्‍या हो गया चोरी दिल ये, या हो गयी लूट ।

बिल में दुबकी सोच रही, मेरी किस्‍मत गयी है फूट ।।

किस्‍मत गयी है फूट, सबको क्‍या मुख दिखलाऊं ।

बिन दिल के अब इस बिल से कैसे बाहर जाऊं ।।

बाहर कुत्‍ते हैं खड़े, करते इंतजार मनुहार ।

पूंछ हिला कर कह रहे, आओ जी सरकार ।।

आओ जी सरकार, हमारे यार, डिनर तैयार रखा है ।

मुर्गे की है स्‍वीट बनाई नहीं जो अब तक चखा है ।।

प्‍लीज जागिये, उठ बैठिये, मैडम अक्‍कलमंद ।

सारे कुत्‍ते आये हैं ले लेकर अपने बिस्‍तर बंद ।।

लेकर बिस्‍तर बंद, द्वार पर वे खड़े भुंकियावैं ।  

देसी और विलाइती सारे अदायें वे दिखलावैं ।।

सारे कुत्‍ते कर रहे पिछले दो हफ्ता से उपवास ।

मैडम संग इक डिनर करिहे पूरी सबकी आस ।।

होगी पूरी सबकी आस, सोच लाइन कुत्‍तन की लग गई ।

बिन दिलवाली मैडम की, भौंका भाकी में निंदिया खुल गई ।।

 

इक अंगड़ाई मार के, फेंक नजर के तीर ।

सब कुत्‍तन को देख के, मैडम भई गंभीर ।।

मैडम भई गंभीर, और फिर दौड़ के बाहर आई ।

मैं इक कुत्‍ते की थी प्‍यारी ये लाइन कहॉं से आयी ।।

है मेरा अलबेला कहॉं, झबरू काला रंग ।

दिल मेरा जो ले गया, कित गया भुजंग ।।

मैं कुत्‍ते की, कुत्‍ता मेरा, पिया वो परम सुहावन ।

डिनर करूं और रूप रचूं  बार बार फिर देखूं दरपन ।।

मेरा झबरू मेरा गबरू नहीं लाइन में आता नजर ।

कित्‍थे है वो मेरा डमरू मैं कराऊंगी उसे डिनर ।।

तभी बीच कुत्‍तों में से था झबरू दौड़ा आया ।

मैं भी इस लैन बिच्‍च में अपनी संगत लाया ।।

ओ हसीना नाजनीना जरा याद करो वो बात बड़ी मशहूर ।

कुत्‍ते सदा झुण्‍ड में रहते मिल बांट कर खाते हैं भरपूर ।।

बीच बीच में भौं भौं कूं कूं, उवाय उवाय भ्‍वयाय ।

जम कर सेवा पूंछ हिलाना, बिना बखत चिल्‍लाय ।।

पर अपनी अपनी किस्‍मत होती क्‍या करिये इसको ठीक ।

जैसी लीला रची विधि ब्रह्मा ने वही होवेगा याद रहे ये सीख ।।

याद ये रखना सीख, नहीं झुण्‍ड शेरों के होते ।

इक अकेला कूद जाये जब सब पानी भरते ।।

नहीं डिनर ना सोवा सावी ना सस्‍ती मस्‍ती करो इन कुत्‍तन के संग ।

शेर कहत बुरा न मानो होली है, आप पर अब आपका फेंक दिया है रंग ।।

 

रविवार, 14 फ़रवरी 2010

व्‍यंग्‍य- वैलेण्‍टाइन एक स्‍टाइल........इस मुर्दे का वैलण्‍टाइन मना दो

वैलेण्‍टाइन एक स्‍टाइल........इस मुर्दे का वैलण्‍टाइन मना दो

नरेन्‍द्र सिंह तोमर ''आनन्‍द''

वैलेण्‍टाइन की धूम में फंसे लाल बजरंग ।

डाल लाल तौलिया नारि में, डण्‍डा लीनो संग ।।

डण्‍डा लीनो संग जोड़े ढूंढ रहे पार्कन में भीतर ।

लोग लुगाई देख कर देते गीदड़ भभकी तीतर ।।

रस्‍साकस्‍सी चल रही, प्रेमपत्र दिवस पे देखो ।

बजरंगी सब टूट रहे, बिन नाथे सॉंड़ हो जैसे ।।

इक बजरंगी मिल गया नेता बनत भुजंग ।

चुपके से हम पूछ लिये, का बात हुयी है तंग ।।

क्‍या बात हुयी है तंग, क्‍यूं खलनायक बन गये ।

बीवी छोड़ के भागी या फिर बहिन को ले गये ।।

क्‍यूं विचलित हो मित्र, चित्‍त में चैन जो धरिये ।

असल क्‍या है बात भई सो अब हमसे कहिये ।।

बजरंगी शरमा गया, बोला, मुख का खोल कपाट ।

क्‍यूं घुमा फिरा कर रहे व्‍यंग्‍य मजाक सपाट ।।

नहीं यार दादा जरा, बात नहीं कुछ खास ।

इक घरवारी जो मिली, नहीं डालती घास ।।

नहीं डालती घास, न उसका रूप सुहावन ।

सो रोकन वैलण्‍टाइन कों ये फार्मूला है पावन ।।

देखें रूप अपार नव यौवना सब मिलें यहॉं पर ।

जो हम ना कर पा रहे, लेते आ आनंद यहॉं पर ।।

देख के पूरा सीन पाते सुख स्‍वर्ग इसी दिन ।

सो रोकन के वास्‍ते, लेना डण्‍डा तान इसी दिन ।।

जो घरवारी से ना मिला, हम उसे यहॉं तलाशें ।

डर जाते प्रेमी युगल और हम फिर उसे तराशें ।।

छोटा सा ये शहर है, पार्क नहीं ना गार्डन भरपूर ।

इक दिन आता साल में सो आते इतनी दूर ।।

ना ताल कटोरा यहॉं कोई, ना बुद्धा सा मेल ।

बस इक दिन के वास्‍ते देखत आकर खेल ।।

देखत आकर खेल, घर जा किस्‍सा कहते ।

पर बेअसर वो बेखबर उस पे रंग न चढ़ते ।।

जो हम डण्‍डा लाते यहॉं, रोकन वैलण्‍टाइन दिवस ।

धमकाने हड़काने चलें साथ लिये हम ये दिवस ।।

नहीं काम आता यहॉं, पर घर रोज दिखलाता जलवा ।

ससुरी वैलेण्‍टाइन मना दे और खिला दे हलवा ।।

पर वे चौथ पंचमी रटती व्रत बतला कर रोज ।

तब फिर हम पर गुस्‍सा छाता, डण्‍डा बरसाते रोज ।।

इतने में थे आ गये पुलिससिया खाकी वर्दी ।

बजरंगी कूटे सभी, दूर करा दी सर्दी ।।

दूर करा दी सर्दी, जम कर लात लगाईं ।

अस्‍पताल भर्ती किये, हिदायत साथ बताई ।।

खबरदार जो नजर आये किसी पार्क के पास ।

थानेदार सा मना रहे न्‍यू वैलंटाइन खास ।।

अस्‍पताल में पड़े बजरंगी यूं कराहें ।

पूरे अस्‍पताल में गूंज रहीं उनकी ये आहें ।।  

इक बजरंगी के सीने पर डाक्‍टर ने आला आन धरा ।

बजरंगी ने बगल खड़ी इक नर्स पे अपना ध्‍यान धरा ।।

देख नर्स की चंचलता, बजरंगी की सांसे रूक गयीं ।

डाक्‍टर बोला इस मरीज की क्‍यूं हलचल रूक गयीं ।।

सीने में धड़कन नहीं, ना नैनों में चंचलता ।

क्‍यूं इस मुर्दे को पुलिस, लायी यहॉं पे नर्स बता ।।

जाओ इसको मुर्दाघर ले जा ठिकाने पर पहुँचाओ ।

मरा दिमाग और मरा शरीर इन्‍हें यहॉं पे मत लाओ ।।  

गुरुवार, 28 जनवरी 2010

कहत कबीर सुनो भई साधो, बात कहूं मैं खरी.......बिजली जावत देख कर, जनता करी पुकार.....

कहत कबीर सुनो भई साधो, बात कहूं मैं खरी.......बिजली जावत देख कर, जनता करी पुकार.....

Narendra Singh Tomar "Anand"

 

कबिरा बिजली देंख के, जब रह गये यूं दंग ।
देख तमाशा अजब सा
, ठानी रच रस रंग ।।
ठानी रच रस रंग
, पदबन्ध रचा ।
लिखा अपढ गँवार जो जन मन बीच बसा ।।
बिजली को तो जाना है
, वक्त से पहले चली गयी ।
दिन भर पूरे गोल रह
, देर रात को आयेगी ।।
टाँग पसार के दिन भर सोवो
, करो रात में काम ।
चढ जा बेटा सूली पे
, बली करेंगे राम ।।
भली करेंगे राम
, जय श्री राम जय श्री राम ।
सदी 18 का मिले
, फोकट ही आराम ।।
बच्चों के पेपर फिर आये
, लेकिन बिजली कभी न आई ।
भर्ती सारे चोर कर लिये जिनने सूंत के करी कमाई ।।
चोर एक चोरी करे
, फिर भी सीनाजोर ।
अपनी चोरी का दे दोष
, कहता जनता चोर ।।
40 साल से चल रही व्यवस्था
, तब नहीं थी जनता चोर ।
चोरों की सत्ता आते ही अब कहते जनता चोर ।।
पूरी बिजली लील गये
, पर ना लई डकार ।
कानन में है रूई ठुसी
, सोय रही सरकार ।।
करोड अरब के करे घुटाले
, फर्जीवाडे खर्च में डाले ।
दारू बीवी और संग में 56 ऐब और हैं पाले ।।
खर्च वसूली लाली लिपिस्टक औ ऊपर की माँग ।
कैसे पूरति होवे इनकी रोज रचें नित इक स्वांग ।।
कछु लुगाई की फरमाइश कछु रखैलन संग ।
जेबें काट काट जनता की
, करें प्रजा कों तंग ।।
भडिया बैठे बिजली घर में रोज करें भडियाई ।
जो कहुँ जनता करे शिकायत
, जानो सिर पे आफत आई ।।
या चोरी का केस लगावै
, या माँगें पनिहाई ।
जो जनता माई बाप कहावे
, भई अब गरीब लुगाई ।।
लोड चेक के नाम पे
, ठांसें रोज डकैत ।
सरकारी लैसन्स पे
, लूटत फिरें भडैत ।।
इन भडियन के राज में
, खूब मचा अंधेर ।
अंधकार कायम रहे
, कोडवर्ड का ये शेर ।।
अब जनता दीखे चोर
, कहें लीलै बिजली जनता ।
जब बिजली थी खूब यहाँ
, काहे चोर बजी न जनता ।।
तब भी काँटे खूब डले थे. खूब जले थे हीटर ।
जम कर बिजली खूब जलाते और नहीं थे मीटर ।।
बिन बिजली के बिल मिल रहे अब अंधाधुंध अनंत ।
अब बढी गयी आबादी
, बोलो सरकारी संत ।।
6 शहर भारत के ऐसे
, आध करोड ऊपर आबादी ।
ना बिजली का पत्ता खडके
, ना ऐसी बर्बादी ।।
काँटे कटिया वहाँ भी डलते
, ए.सी. हीटर की भरमार ।
पहले झाँको गिरेबान में गुण्डा भडियन के सरदार ।।
हालत गुण्डा राज की
, देख कें रहे कबीरा रोय ।
पब्लिक नर्राती फिरे
, राजा रहो है सोय ।।
राजा रहो है सोय. कान में डारे नौ मन तेल ।
पाछें रजिल्ट से बुरो रहे
, छात्रों यही करमन के खेल ।।

 

नरेन्‍द्र सिंह तोमर ''आनन्‍द''
........क्रमश: जारी रहेगा अगले अंक में

 

रविवार, 24 जनवरी 2010

कहत कबीर सुनो भई साधू.....बात कहूँ मैं खरी____

कहत कबीर सुनो भई साधू.....बात कहूँ मैं खरी

नरेन्‍द्र सिंह तोमर ''आनन्‍द''

 

कबिरा फँसे बाजार में, माँगें खुद की खैर ।
कापीराइट में ले गये सब रचनन के खैर ।।
पढे लिखेन की मंडी में
, कबिरा अपढ गंवार ।
कवियन मूरख नाम धर
, इज्जत रहे उतार ।।
इज्जत रहे उतार
, सुनावें नित नूतन कविता ।
कबिरा रोय पुकार
, कित गयी छंद की सविता ।।
ना दोहा ना चौपाई
, ना रोला ना मुक्तक ।
कहाँ सवैया
, सोरठा ना रची कुंडली अभी तक ।।
बडे बडे कविराय
, मण्डी के मठराज सलाह कबीरा दीनी ।
जाइन मठ कर
, लिख तारीफा जो आपुन हित चीन्ही ।।
वरना रहे फकीरा बन फिरे गरीबा गमछा टांगे फिरिहे ।
नहीं होय उद्धार ना बेडापार जो तारीफ हमारी ना करिहे ।।
पावै लाभ अपार यूनियन गर नूतन कविता की लेवे ।
हैल्मेट बिन बीमा के कोऊ कवि सम्मेलन में ठुकवे ।।
बस करता जा तारीफ
, पल्ले भले ना अधेला समझे ।
तुकबंदी बकवास की ये नूतन कविता समझे ।।
हैलमेट औ बीमा संग ट्रेनिंग कविता की देंगे ।
टैक्नालाजी औ मार्केटिंग संग कवि कबिरा नाम धरेंगे ।।
कहाँ फकीरी और गरीबी में लिये ताँत और बान ।
हुक्का बीडी और तमाखू
, कैसे मिटे थकान ।।
ऊँच सोसाइटी ऊँची संगत ऊँची बडी दुकान ।
कविता बिकती तारीफें बिकतीं बिकता है सम्मान ।।
चढी पसेरी हाट में तुलतीं
, कबिरा की पद बन्ध ।
कबिरा उलट बांसी ऐसी रची प्रस्तुत ये इक बंध ।।
ज्यों की त्यों धर दीनि चदरिया अब बोले संत कबीर ।
प्रिया फकीरी और गरीबी इनसों पैदा भयो कबीर ।।
ना नूतन पाखंड चहूँ
, ना चाहूँ बडी दूकान ।
मंडी तुम्हार चलती रहबे होय फरक पहचान ।।
कबिरा एम.ए. ना करी
, ना बन पाये अन जीनियर ।
पर पी.एच.डी. कर रहे कई कबिरा औ रहीमा पर ।।


.....जारी रहेगा क्रमश:

 

नरेन्‍द्र सिंह तोमर ''आनन्‍द''

 

 

शनिवार, 5 दिसंबर 2009

व्यंग्य को आलोचना की बैसाखी की जरूरत नहीं- के.पी. सक्सेना

व्यंग्य को आलोचना की बैसाखी की जरूरत नहीं- के.पी. सक्सेना
हिन्दी व्यंग्य एवं आलोचना पर राष्ट्रीय संगोष्ठी सम्पन्न

Anup Srivastava,  9335276946 Lucknow
लखनऊ, 30 नवम्बर

हिन्दी व्यंग्य साहित्यिक आलोचना की परिधि से बाहर तो है ? इस विषय पर आज उत्तर प्रदेश भाषा संस्थान और माध्यम साहित्यिक संस्थान की ओर से अट्टहास समारोह के अन्तर्गत आयोजित दो दिवसीय विचार गोष्ठी में यह निष्कर्ष निकला कि व्यंग्यकारों को आलोचना की चिन्ता न करते हुये विसंगतियों के विरूद्ध हस्तक्षेप की चिन्ता करनी चाहिये, क्योंकि वैसे भी अब व्यंग्य को आलोचना की बैसाखी की जरूरत नहीं।
राष्ट्रीय संगोष्ठी की शुरूआत प्रख्यात व्यंग्यकार के.पी. सक्सेना की चर्चा से शुरू हुयी। श्री सक्सेना का कहना था कि हिन्दी आलोचना को अब व्यंग्य विधा को गंभीरता पूर्वक लेना चाहिये। उन्होंने यह भी कहा कि अब व्यंग्य को आलोचना की बैसाखी की जरूरत नहीं है। व्यंग्य लेखन अपने उस मुकाम पर पहुंच गया है जिसमें राजनीति, समाज एवं शिक्षा जैसे सभी पहलुओं को अपने दायरे में ले लिया है अब वह किसी आलोचना का मोहताज नहीं है।
यह गोष्ठी राय उमानाथ बली प्रेक्षागार के जयशंकर प्रसाद सभागार में आयोजित की गयी थी जिसमें देश गिरीश पंकज, अरविन्द तिवारी, बुद्धिनाथ मिश्र, सुश्री विद्याबिन्दु सिंह, डा0 महेन्द्र ठाकुर, वाहिद अली वाहिद, अरविन्द झा, सौरभ भारद्वाज, आदित्य चतुर्वेदी, पंकज प्रसून, श्रीमती इन्द्रजीत कौर नरेश सक्सेना, महेश चन्द्र द्विवेदी, एवं अन्य प्रमुख लेखकों ने अपने विचार प्रकट किये। गोष्ठी का समापन माध्यम के महामंत्री श्री अनूप श्रीवास्तव के धन्यवाद प्रकाश से हुआ। इससे पूर्व संस्था के उपाध्यक्ष श्री आलोक शुक्ल ने आशा प्रकट की कि प्रस्तुत संगोष्ठी के माध्यम से व्यंग्य लेखन को उसका आपेक्षित सम्मान मिल सकेगा।
अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में उत्तर प्रदेश भाषा संस्थान के कार्यकारी अध्यक्ष और सुविख्यात व्यंग्यकार श्री गोपाल चतुर्वेदी ने कहा कि व्यंग्यकार लेखन करते रहें एक न एक दिन आलोचना उनकी ओर आकर्षित होगी। उन्होंने नये व्यंग्यकारों से आग्रह किया कि वे समाज की बेहतरी के लिये लिखते रहें और आलोचना की परवाह न करें।
अट्टहास शिखर सम्मान से कल नवाजे गये डा0 शेरजंग गर्ग का कहना था कि आज जितने भी व्यंग्यकार स्थापित हैं वे अपनी गंभीर लेखनी के कारण ही प्रतिष्ठित हैं। आलोचकों की कृपा पर नहीं हैं। कवि आलोचक नरेश सक्सेना ने नागार्जुन की व्यंग्य का जिक्र करते हुये व्यंग्य की शक्ति प्रतिपादित की।
हिन्दी संस्थान के निदेशक डा0 सुधाकर अदीब का कहना था अगर व्यंग्य लेखन में गुणवत्ता का ध्यान रखा जाय तो हमें आलोचना से घबराना नहीं चाहिये। श्री महेश चन्द्र द्विवेदी का कहना था कि हास्य और व्यंग्य अलग-अलग हैं इनको परिभाषित करने की आवश्यकता है। श्री सुभाष चन्दर जिन्होंने व्यंग्य का इतिहास लिखा है का कहना था कि व्यंग्य लेखन को दोयम दर्जे का साहित्य समझा जाता रहा है लेकिन हिन्दी के संस्थापक सम्पादक स्व0 बाल मुकुन्द गुप्त ने लिखा है कि मैंने व्यंग्य के माध्यम से लोहे के दस्ताने पहनकर अंग्रेज नाम के अजगर के मुंह में हाथ डालने का प्रयास किया था। आवश्यकता इस बात की है कि हम व्यंग्य के सौन्दर्य शास्त्र को समझंे और आलोचना की समग्र पक्षों के अनुरूप व्यंग्य लेखन का विकास हो। हरिशंकर परसाई पुरस्कार से विभूषित सुश्री अलका पाठक ने कहा- व्यंग्य की आलोचना अनुचित है हम असंभव लेखन को भी संभव करके अपनी उपस्थिति दर्ज करवाते हैं। श्री अरविन्द तिवारी का कहना था कि व्यंग्य के माध्यम से हम आम जनता का ध्यान तमाम विषयों पर दिला पाते हैं। श्री बुद्धिनाथ मिश्र ने कहा- व्यंग्य कोई नयी विधा नहीं है विदूषकों की परम्परा रही है। व्यंग्य को निंदारस मानना गलत होगा। वास्तव में यथार्थ की विदू्रपता पर आक्रोश व्यंग्य के माध्यम से व्यक्त किया जाता है। श्री गोपाल मिश्र का कहना था कि अच्छा व्यंग्य छोटा साहित्य होता है अतः इसे परिभाषित करने की आवश्यकता नहीं है।
डा0 महेन्द्र कुमार ठाकुर का कहना था कि हम व्यंग्यकार हैं और हमें अपने साहित्यिक शिल्प को मजबूत करने की आवश्यकता है। श्री वाहिद अली वाहिद का कहना था कि व्यंग्य हमारी परम्परा में रहा है और नई पीढ़ी को इसे आगे बढ़ाना चाहिये। श्री रामेन्द्र त्रिपाठी का कहना था कि व्यंग्यकार मूलतः आलोचक ही है इसकी लोकप्रियता ही इसकी सफलता का मापदण्ड बनता है। श्री आदित्य चतुर्वेदी के विचार मे समाज के सुधार में व्यंग्य की प्रमुख भूमिका है। श्री भोलानाथ अधीर के विचार में लेखक का दायित्व है कि वह समाज की कमियों को उजागर करे और उन पर प्रहार करे इसके लिये व्यंग्य एक सशक्त माध्यम है।



रविवार, 15 नवंबर 2009

दीनबन्धु भये मंत्री -अफसर, नेता दीनानाथ कहाये (दैनिक मध्‍यराज्‍य)

दीनबन्धु भये मंत्री -अफसर, नेता दीनानाथ कहाये

गोपाल दास गर्ग

जनता बनी है सानी सबकी

दीनबन्धु भये मंत्री -अफसर, नेता दीनानाथ कहाये।

दीन हीन जनता ने पूजा, फिर भी उसके कष्ट बढ़ृाये ॥1॥

कुर्सी-धारक करते मनमर्जी, नहीं सुनते हैं किसी की अर्जी. ॥2॥

 मंत्री खाता, अफसर खाता, नेता खाता और खिलाता।

जनता बनी है  सानी सबकी, सत्ताकी खदान में खाता ॥ 3॥

धन लोलुपता की बाढ़ आ गई, मान वहे मनमानी में।

घर-द्वार सब चौपट हो गया, आपसी खींचातानी में ॥ 4॥

धन आधारित राजनीति में, नैतिकता का हरण हुआ।

देश समर्पित नेताओं का, राजनीति से क्षरण हुआ ॥ 5॥

शासन और प्रशासन में, धरणीधर का मान है।

आम प्रजाजन रोता फिरता,नहीं कोई पहचान है॥ 6॥

दलतंत्र भगाओं- जनतंत्र बचाओं अभियान में,

सबका कद समान है। ना ही कोई छोटा-बड़ा ना कोई पद पहचान है।

तरण करेगा इस पीड़ा से, ऐसा यह अभियान है ॥ 7॥

प्रस्तुती..गोपालदास गर्ग मुरैना