मंगलवार, 26 अगस्त 2008

हास्‍य/व्‍यंग्‍य -आओ चलो अखबार निकालें, विज्ञापन पायें, गरीबी हटायें - नरेन्‍द्र सिंह तोमर ‘’आनन्‍द’’

हास्‍य/व्‍यंग्‍य

आओ चलो अखबार निकालें, विज्ञापन पायें, गरीबी हटायें

चम्‍बल विकास प्राधिकरण को बने तो 25 साल हो गये, करोड़ो खर्च के बाद अब दोबारा बनेगा क्‍या

नरेन्‍द्र सिंह तोमर ''आनन्‍द''

सरकार को टेन्‍शन है कि एक अरब लोगों में केवल तीन आदमी अरब पति हैं, बकाया एक अरब सब इनकी पत्‍नीं हैं यानि हाल कंगाल हैं, सरकार फालतू ही नर्राती रहती है, बेकार ही मंजीरे पीटती रहती है कि गरीबी हटाओ । इंदिरा जी भी चिल्‍लातीं थीं गरीबी हटाओ, चिल्‍लाते चिल्‍लाते शहीद हो गयीं मगर गरीबी शहीद न हुयी । गरीब और गरीब होता गया, अमीर को अमीरी रास आ गयी वह और अमीर होता गया । गरीब को गरीबी रास आयी, गरीब की पॉकेट से पैसा अमीर का जिन्‍न लपक कर अमीर की तिजोरी में पहुँचाता रहा । एक हजार गरीब का हैण्‍ड फैन छिन गया तो एक अमीर का ए.सी. लग गया । एक हजार गरीब को एक वक्‍त की रोटी कुर्बान करनी पड़ी तो अमीर के कुत्‍ते के लिये विदेशी बिस्‍कुट का पैकेट आ गया । अमीर अतिअमीर होते रहे गरीब अति गरीब, का करिये अपने अपने नसीब की बात है, अंग्रेजी में एक कहावत होवे है कि अमीर का छोरा मुंह में सोने की चम्‍मच लेकर पैदा होता है, गरीब का बेटा कभी दिल में छेद ले आता है तो कभी पाकिट में सूराख कभी कभी तो ससुरा मुकद्दर ही चलनी सा ले आता है । अब चलनी में दूध दुहोगे तो कर्मन कों दोष क्‍यों देवोगे । गरीब के पास राशन कार्ड बनवाने के पैसे नहीं होते, गरीबी रेखा में नाम लिखाने के पैसे नहीं होते । अब गरीबी रेखा की सूची खाली तो नहीं रखी जा सकती, सो जो दे सकता है वह आई आर डी पी में बिलो पावर्टी लाइन बन जाता है, देने की ताकत अमीरों के पास होती है, मामला फंस जायेगा तो उसे सुल्‍टाने की ताकत भी अमीरों की पॉकिट में होती है, गरीब के पास तो भुखमरी का घण्‍टा रहता है, चौबीस घण्‍टे बजाता है, हरिकीर्तन करता है, बड़ी आस से मन्दिर, मस्जिद गुरूद्वारे जाता है, दीवाली को उधार मांग कर कर्ज लेकर भी लक्ष्‍मी पूजन करता है कि मैया इस साल भण्‍डार भर देना भरपूर कर देना, लक्ष्‍मी मैया इठलाती है, इतराती है कहती है कि पहले भण्‍डार तो बता कि कहॉं है तेरा जिसे मैं भरूं, अपनी तिजोरी तो दिखा जहॉं जाकर बैठ जाऊं, गरीब के पास न तिजोरी है न भण्‍डार, रोज आधा एक किलो आटा, ढाई सौ ग्राम आलू और दो प्‍याज की गॉंठ खरीद लाता है, और लक्ष्‍मी से कहता है मैया वो जो साइड में पॉलीथिन पड़ी है, वही मेरा गोदाम है, मेरा भण्‍डार है, इसे भरपूर कर, मैया ठठा कर हँसती है, फिर गरीब बोलता है कि ये जो मेरी फटी बुशर्ट की फटी जेब है और किवाड़ की कुण्‍दी पर लटकी है यही मेरी तिजोरी है इसमें आन विराजो महारानी ।

लक्ष्‍मी मुस्‍कराती हुयी अपनी पूजा कर खिसक लेती है और उसकी ढाई सौ ग्राम की समाई साइज की पॉलीथिन में ढाई सौ ग्राम का खाता खोल देती है, उसकी फटी बुशर्ट की फटी जेब में भी जीरो बैलेन्‍स अकाउंट खोल देती है और जेब के सूराख से ही बाहर खिसक लेती है, और किसी बड़ी तिजोरी बड़े भण्‍डार वाले का गोदाम तलाशने निकल पड़ती है ।

सरकार फिर चिल्‍लाई, गरीबी हटाओ, पता नहीं किससे कहा, पता नहीं किसने सुना । मगर एक दिन पिछले साल सब सरकारी अफसरान ने एक दिन गरीबी हटाने के लिये अर्पित किया, गरीबी हटाने की शपथ हाथ आगे बढ़ा बढ़ा कर ले डाली, ससुरी शपथ क्‍या संकल्‍प कर डाला, वे सब बोले हम गरीबी हटायेंगें । हमने सारे फोटू इकठ्ठे करे और लघु फिल्‍म बना डाली (ग्‍वालियर टाइम्‍स वेबसाइट पर अभी भी चल रही है ) फिल्‍म बहुतों ने देखी, सरकार की बात भी बहुतों ने सुनी, अखबारों के जरिये या मीडिया के नजरिये ।

पर कोई नहीं चेता, कोई नहीं जागा, शपथ लेकर हाल ही सब भूल गये । गरीब ससुरा गरीब होता ही गया फटेहाल फक्‍कड़ होता गया । अब का हो, सवाल बड़ा विषम था । लेकिन हमारे देशभक्‍त चेते, उनने गरीबी दूर करने का बिना शपथ लिये बीड़ा उठाया, गरीबी किल करने की सुपारी ले ली । और लग बैठे देश की गरीबी मिटाने में, कोई बोला गरीब से, कोई का एजेण्‍ट बोला तो कोई का कन्‍सल्‍टेण्‍ट गरीब का हमदर्द बना किसी किसी के बिजनिस एसोसियट गरीब की गरीबी दूर करने गरीब के पास जा पहुँचे । और बोले हमने गरीबी किलिंग की सुपारी ली है, बीड़ा चबाया है (पहले बीड़ा चबाया जाता था, स्‍वतंत्रता के बाद उठाया जाता है )

बीड़ा उठाया तांत्रिकों ने, फायनेन्‍स कम्‍पनीयों, बैंक, शेयर ब्रोकर्स और बीमा कम्‍पनीयों ने । सबने ऐलाने जंग किया '' हम मिटायेंगें गरीबी'' फतहयाबी के आमीन बांचे । और चले गरीबी दूर करने बाबाजी और तांत्रिक गॉंवों और शहरों की निपट गंवार दिमाग से पैदल गरीब बस्तियों में पहुँचे और बोले हम मिटायेंगें बच्‍चा तेरी गरीबी, तेरे संकट का टैम खतम हुआ, अब तू भारत के पॉंच पहले अमीरों में शुमार होगा, फोर्ब्‍स पत्रिका की हिट लिस्‍ट में तेरी सम्‍पदा अंकेगी । पी एम, सी एम तेरी मुलाकात को तरसेंगें तुझे बुलाने के लिये सरकार करोड़ों रूपया फूंकेगी, रेड कार्पेट डालेगी तुझे प्र जमीन पे नहीं धरने पड़ेंगें , राल्‍स रायस में ऐशो सफर करेगा, तेरे घर से पेलेस ऑन व्‍हील्‍स निकलेगी । हसीनायें तेरी बाट जोहेंगीं, दस सुन्‍दरियां सोते से मनुहार कर मधुर संगीत सुनाते हुये जगायेंगीं, दस नवयौवनायें बिना बु्रश के तुझे मंजन अंजन करायेंगीं, दस और इठलातीं जिन्‍न परीयां तुझे स्‍नान ध्‍यान करायेंगीं, महकते इत्र और तैरती खुशबुओं के बीच हमाम में पड़ा इन परियों से मालिश करवा कर मैल छुड़वायेगा, फिर नई हुस्‍न मलिकायें तुझे वस्‍त्र पहनायेंगीं, दस और नवयुवतियां आकर तुझे नाश्‍ता करायेगीं ।

हाथ बांधे सिर झुकाये तेरे सामने फकीर फक्‍कड़ों की लाइन लगी होगी, तू बांटता जायेगा मगर तेरा खजाना उतना ही बढ़ता जायेगा । आफिस में दस सुन्‍दरीयां तेरी स्‍टेनो होंगीं हर समय बस तेरी सूरत पर नजर रखेंगीं और क्‍या हुक्‍म है मेरे आका पुकारतीं होंगीं । एक हजार एकड़ जमीन में तेरा बंगला होगा, अम्‍बानी कां बंगला और मित्‍तल का बंगला उसके बेटे के बंगले और बेटी के बंगले सबके सब तेरे पास गिरवी धरे होंगें ।

टाटा का सिलबट्टा जैसे 75 पैसे में आज तलक गिरवी पड़ा है, धर्मेन्‍द्र बीकानेर वाले पर जैसे एक होटल पान वाले के दो रूपये पिचहत्‍तर पैसे आज तलक उधार हैं, ऐसे अरबपति के खाते तेरे चौके से गुजरेंगें । बस उठ और फलां जगह दबे फलां राजा या फलां बंन्‍जारे का खजाना खोद ले हम तुझे दिलवायेंगें, खरचा मगर पचास हजार से ऊपर का होगा । गरीब ने उनके ख्‍वाब सिर ऑंखों लिये और निकल पड़ा फोर्ब्‍स पत्रिका में अपना नाम लिखाने । कर्ज जुगाड़ा, चोरी करी, डाका डाला, घर बेचा, जेवर बेचा, बिटिया गिरवी रखी, बेटा बंधुआ रखा, पचास हजार इकठ्ठे करके लाया बाबा तांत्रिक को सौंपे, बाबा ने जमीन खुदवा कर पॉंच चांदी के सिक्‍के भी दिये और कहा ये सैम्‍पल है, चेक करवा ले, अब इस खजाने पर सवार मसान या प्रेत कहता है कि बकाया माल दीवाली की अमावस को निकलेगा, तब तक रोज यहॉं घी का दीपक जलाना, किसी को यहॉं फटकने न देना, और सावधान अशुद्धि न हो जाये वरना खजाना पाताल चला जायेगा ।

गरीब खुदी जगह पर झोंपड़ी डाल कर बैठ गया, रोज दीपक जलाता और दीवाली की अमावस की रात का इन्‍तजार करता । साल भर बाद बाबा तांत्रिक फिर पधारे बोले चल निकाल पॉंच हजार नकद और दो बोतल दारू खालिस अंग्रेजी, तीन मुर्गा और सोलह नीबू । गरीब ने फिर जुगाड़ कर सामान और पैसा बाबा को दिया, बाबा और उसके चेलों ने गरीब का नाम फोर्ब्‍स पत्रिका में लिखाने को कर्मकाण्‍ड शुरू किया दो दो ढक्‍कन दारू काली और भैरों को चढ़ायी बकाया परसादी खुद और चेलों ने पा ली । मुर्गों  का रक्‍त काली और भैरों पर चढ़ा, मुर्गे परसादी बन कर बाबा और चेलों के पेट में समा गये ।

बाबा ने चाण्‍डाल चौकी का पहरा बिठाया, सिन्‍दूर का चौकोर घेरा बनाया और फूं फां, धूं धां, ठं ठं ठ: ठ: करता रहा, थोड़ी देर बाद देव प्रकट हुये फिर प्रेत भी आ गया फिर जिन्‍न भी आ पहुँचा, सब बोले चिल्‍लाकर बोले अशुद्धि अशुद्धि अशुद्धि, घोर संकट, बाबा तू भाग जा वरना निपट जायेगा । अलौकिक (दिखाई न देने वाली) आत्‍मायें नशें में झूमते चेलों की बाडी में घुस बैठीं थीं, सबके सब बोले, इसने गलती की है , इसे खजाना हम नहीं दे सकते, बाबा बोला क्‍या गलती हुयी है उसे तो बताओ, सब आत्‍मायें एक सुर में बोलीं इसकी पत्‍नी हर महीने, महीने से (रजस्‍वला) होती थी लेकिन ये उन दिनों भी दीपक लगा देता था, घोर अशुद्धि, पाप कर्म, और देखते देखते गरीब का खजाना पाताल में समा गया । बेचारा गरीब, फोर्ब्‍स में आते आते जरा सी चूक से वंचित हो गया ।          

कल एक प्रसिद्ध व प्रतिष्ठित समाचार पत्र की फ्रण्‍ट पेज की सेकण्‍ड लीड थी कि भाजपा बनायेगी चम्‍बल विकास पाधिकरण, खबर चौंकाने वाली और झन्‍नाटेदार थी, पढ़ कर हम चौंके भी और सन्‍नाटे में भी आ गये । फिर अखबार के ऊपर ध्‍यान गया तो भाजपा का विज्ञापन सरकारी पैसे से अखबार में लगा था, पहले यह टॉप एड अन्‍य अखबारों में भी चलता रहा है, इस प्रकार के विज्ञापन इण्‍टरनेट पर चला करते हैं और इन्‍हें टॉप एड कहते हैं, जो बहुत मंहगे होते हैं, अखबारों में इस प्रकार के विज्ञापन प्रकाशन का रिवाज कभी नहीं रहा, पहली दफा मध्‍यप्रदेश के अखबारों में यह प्रयोग देखने को मिल रहा है, खैर कोई बात नहीं नवाचार और अधुनातन का जमाना है यह भी चलेगा । वैसे भी ग्राहक आजकल अखबार खबर के लिये नहीं विज्ञापन के लिये पढ़ता है । इसलिये अखबारों का 70 से 75 फीसदी भाग केवल विज्ञापन से आवृत्‍त रहता है, अखबार वाले इसे जानते हैं इसलिये खबरें नहीं विज्ञापन छापते हैं, जो अखबार विज्ञापन नहीं छापते वे आजकल बिका नहीं करते, उन्‍हें घटिया अखबार माना जाता है । उन्‍हें कोई नहीं पढ़ता । पढ़ना भी नहीं चाहिये, उपभोक्‍ता अखबार खबर के लिये नहीं विज्ञापन के लिये अखबार खरीदता है । खबर नहीं छपेगी कोई बात नहीं, विज्ञापन नहीं छपे तो उपभोक्‍ता लपक कर उपभोक्‍ता फोरम चला जायेगा । अखबार वाले इस बात को जानते हैं, सो विज्ञापन देवो भव: । विज्ञापन दाता ईश्‍वरो भव: । सो अखबार बेचारे 70 अस्‍सी फीसदी भाग में विज्ञापन छापा करते हैं ।

अब कोई विज्ञापन देवेगा, माने झूर कर पैसा भी देवेगा, अब जब देवेगा तो कुछ लेवेगा भी । भइया बड़ी साधारण सी बात है मक्‍खन लगवायेगा, चमचागिरी करवायेगा, पैर दबवायेगा, घुटने सहलवायेगा । वगैरह वगैरह ।

चलो अखबारों ने टाप एड प्रक्रिया चालू कर दी है, अच्‍छा है अखबार भी ग्‍लोबलाइज हो रहे हैं, पहला ग्‍लोबलाइजेशन जब हुआ था जब इनका साइज कतर कर पौना हो गया था, पहले दिल्‍ली के अंग्रेजी अखबार टाइम्‍स आफ इण्डिया पौना हुआ था, उसके बाद ग्‍वालियर के अखबार इण्‍टरनेशनल स्‍टैण्‍डर्ड के हो गये थे । मगर दाम बढ़ कर सवाये हो गये थे । हूं तो नई कहावत यूं बनी कि ''साइज पौना दाम सवाये'' वाह क्‍या इन्‍वेन्‍शन है । चलो अखबारों ने एक नई कहावत का इन्‍वेन्‍शन करा दिया ।

वैसे तो अखबार एक ही विज्ञापन एक ही अखबार में अलग अलग अलां फलां संस्‍करण (संस्‍करण दो पन्‍ने या एक पन्‍ने का होता है) में अलग अलग छाप कर पैसे दुगने तिगुने करते रहते हैं ।

यह भी एक इन्‍वेन्‍शन हैं, एक रहस्‍य है, देश के लोग फालतू ठोकरें खातें फिरते हैं और पैसा दुगुना तिगुना करने के चक्‍कर में मारे मारे फिरते हैं, कभी कोई बाबाजी या तांत्रिक दुगुना तिगुना का चक्‍कर चला कर चूना लगा जाता है तो कभी शेयरबाजी में घर बर्बाद हो कर लोग सड़क के खण्‍डों पर आ जाते हैं, कभी कोई फायनेन्‍स कम्‍पनी चूना लगा जाती है तो कभी कोई बीमा कम्‍पनी या बैंक की योजना में झांसा देकर फांसा जाता है ।

इन देश वासीयों को कोई अक्‍ल दे, अगर धन दूना तिगुना चौगुना सोलह या हजार गुने तक करना है तो एक अखबार निकालो, संस्‍करण बढ़ाओ, या एक ही संस्‍करण पर अलग अलग छाप लगाओ यानि अलग अलग बार मशीन पर चढ़ाओ और लिखो अलां जगह या फलां जगह से प्रकाशित । अरे मूर्ख देशवासीयों संस्‍करण निकालो, अखबार निकालो हर अलग संस्‍करण के लिये एक ही विज्ञापन कई बार मिलता या छपता है । मेरे प्‍यारे बेवकूफ देशवासीयो तुम्‍हारी जेब पर जो तमाम टैक्‍सों से जेब कतरी होती है उसका साठ फीसदी विज्ञापन पर जाता है, अपनी जेब से गये का कई गुना वापस चाहिये तो अखबार निकालो, मल्‍टी संस्‍करण हो जाओ । गरीबी हटाओ, फोर्ब्‍स पत्रिका में नाम लिखाओ ।

आम के आम गुठलियों के दाम, विज्ञापन से आय, ब्‍लैकमेलिंग से धनवृद्धि, ठांसे और झांसे से कार्य सिद्धि, परिशिष्‍ट प्रकाशन से आय वृद्धि, भ्रष्‍टों से रिश्‍तेदारी और नातेदारी जॉब में सुनहरा मौका, कहॉं खोये हो देश वासीयो, कहॉं लफड़े में फंसे हो, बैंक बीमा शेयर और बाबाओं के चक्‍कर में । अखबार निकालो संस्‍करण छापो ।

चुनाव टैम पर वारे न्‍यारे, इलैक्‍शन डेस्‍क निकालो, जो दे उसको नेता बना दो, जो न दो उसे पैदल कर दो, प्रोजेक्‍ट चला दो, विकास पुस्तिका छाप दो हर जिले पर बीस लाख मिलते हैं, अरे कहॉं सोये हो मूर्खो, जागो, उठो, सुनहरी सुबह तुम्‍हारा इन्‍तजार कर रही है, चमकता दिनकर, उगता भास्‍कर तुम्‍हें पुकार रहा है ।  कई अखबार तो केवल विज्ञापन के लिये ही छपा करते हैं, वे विज्ञापन मिलने पर ही अखबार छापा करते हैं, विज्ञापन और गरीबी हटाओ के इस अचूक रिश्‍ते को देख समझ मध्‍यप्रदेश सरकार के कई मंत्रियों ने अपने अपने अखबार निकालने शुरू कर दिये हैं, और कई टी.वी. चैनल चालू कर डाले हैं, सूत्र बताते हैं मुख्‍यमंत्री शिवराज सिंह भी कई अखबारों और टी.वी. चैनलों में इस नायाब फार्मूले के लिये पार्टनर शिप हथिया लिये हैं । पहले किसी जमाने में कहते थे कि '' अगर तोप मुकाबिल हो, तो अखबार निकालो'' आज कहते हैं कि-

अगर गरीबी हो मुकाबिल तो अखबार निकालो ।

चाहिये अकूत सम्‍पत्ति तो अखबार निकालो ।।

अगर टेंशन बने कोई देशभक्‍त तो निपटाना है आसां ।

छापो फर्जी खबर, केस लपेटो, चलो अखबार निकालो ।।

अगर परेशां हो पैसा बढ़ाने की खातिर, नहीं सुनता पुलिस वाला फरियाद जो तेरी ।

अरे मूरख उठ जाग मुसाफिर भोर भई, अखबार निकालो ।।

अगर नहीं है मुकाबला तेरा वश में भ्रष्‍ट अफसर और नेताओं से ।

अब चेत जा और छाप डाल, बस कर इतना एक अखबार निकालो ।।

नहीं है गर दौलत की मेहरबानी तुझ पर, नहीं बढ़ता पैसा तेरा बैक, बीमा शेयर से अगर ।

फिक्र छोड़, उठ जाग, छाप धड़ाधड़ संस्‍करण अनेक और अखबार निकालो ।।

छोड़ देशभक्ति के चोंचले, छोड़ गरीब की आवाज उठाना, मूरख भूखों मर जायेगा ।

चेत जाग धन की देवी लक्ष्‍मी पुकारती तुझे, उठो और अखबार निकालो ।।

समझ आयोजित और प्रायोजित के अर्थ, अखबार चला ले जायेगा ।

अगर है चमचागिरी और मक्‍खनमारी की कला से सम्‍पन्‍न, ढेरों विज्ञापन पा जायेगा ।।

पुलिस वाले की तरह फरियादी से भी ले, मुल्जिम से भी वसूल ।

इतनी समझ गर आ गयी तुझे तो पक्ष विपक्ष दोनो से मिलेगा धन तुझे, चलो उठो अखबार निकालो ।।

पाठक बना रहेगा, कन्‍जूमर कहलायेगा, जेब पर टैक्‍स ठुकेंगें कई, चौतरफा लुट जायेगा ।

अगर ठिकाने लगाने हैं ब्‍लैक मनी के पैसे तुझे, हजम भ्रष्‍टाचार की कमाई, उठ जाग चलो अखबार निकालो ।।

यदि है परेशान पत्रकारों से नेताओं से और फर्जी शिकायतों से ।

अरे चेत नादान, सीख मंत्र वशीकरन का अब जाग उठ और चलो अखबार निकालो ।।

नहीं सुनेगा देस में कोई बात तेरी, नक्‍कारखाने में तूती बन रह जायेगा ।

बिन नर्राये जो चाहे, कान में मोबाइली मंत्र फूंकना सारे कारज सिद्ध करना तो चलो अखबार निकालो ।।

अखबार निकाला और सिद्ध हो गये हजारों जोगी, शेष सब जोगना हो गये ।

कभी बेचते थे मूंगफली, चराते थे भैंसे, ढोते थे रिक्‍शा, हांके थे तांगे, आज पत्रकार हो गये ।।

नहीं है दो कौड़ी की कदर जो तेरी, चिन्‍ता न कर उनकी भी नहीं थी कभी ।

उन्‍हें भी जलालत झेलनी पड़ी थी कभी, मारा पुलिस ने था अफसरों ने दफ्तरों से भगाया था, पत्रकार बने तो माननीय हो गये ।।

बनेगा पत्रकार, मिटेगा अंधकार, जीवन में उजाला छा जायेगा, गुण्‍डे से माननीय हो जायेगा ।

अरे बेवकूफ फेंक बन्‍दूक आ चम्‍बल के गहरे भंवर तले, लगा मशीन छाप अखबार बिन बन्‍दूक का शाही डकैत हो जायेगा ।।

कहॉं खाक छानता है चम्‍बल के बीहड़ों में दो चार पकड़ में क्‍या कमा पायेगा ।

पौना पुलिस ले जायेगी, चौथाई के लिये मारा जायेगा, फेंक बन्‍दूक बीहड़ की गहरी खाई में चल आ बन जा माननीय, उठ जाग और चलो अखबार निकालो ।।

भटकता फिरता है चोरी भडि़याई करते, किसी दीवाल से फिसलेगा मारा जायेगा ।

केवल दस परसेण्‍ट पर चोरी में क्‍या कर पायेगा, नब्‍बे खाकी खायेगी, छोड़ ये जान का संकट उठ जाग और चलो अखबार निकालो ।।

कई चोर थे, कई पिटे भी थे कई की इज्‍जत तार तार हुयी थी कभी मगर तब जब वे पत्रकार नहीं थे ।

पत्रकार हुये और पुज गये, सारे काम सफेद हो गये, मिलतीं हैं लड़कियां भी शराब और मुर्गे भी उन्‍हें, अरे मूरख जाग उठ और अखबार निकालो ।।

कभी वे तरसते थे, छिपके हसीनाओं के निहोरे करते थे, शराब की बूंद को तरसा करते थे, बोतल खाली कबाड़ी से खरीद कर उन्‍हें उल्‍टी कर नब्‍बे बूंद टपका कर प्‍याला भरते थे जो ।

पत्रकार बने तो दिन फिर गये, अम्‍बाह जौरा और रेशमपुरा तक सरकारी गाड़ी में जायेगा, सुन्‍दरीयों के साथ दिन औ रात बितायेगा, सरकारी शराब और मुर्गे चाटेगा, फिर भी न तू अघायेगा, जाग बेवकूफ उठ चलो अखबार निकालो ।।

क्‍या कलेक्‍टर क्‍या कमिश्र्नर, मंत्री भी क्‍या औ संतरी भी क्‍या ।

अब बेवकूफ खुदी को कर बुलन्‍द इतना कि सब तुझसे पूछें बता तेरी रजा क्‍या है, बस जाग चेत उठ एक अखबार निकालो ।।

वह वक्‍त वह बातें हवा हुयीं, जब अखबार निकलते थे स्‍वतंत्रता की लड़ाई के लिये ।

अब तू छाप अखबार गरीबी हटाने के लिये, चमचागिरी करने के लिये प्रचार साधन के लिये ।।

अरे पगले, भ्रष्‍ट अफसर नेता औ बाबू कीमती ध्‍ारोहर हैं देश के लिये ।

नहीं बढ़ने देते मुद्रा स्‍फीति, नहीं करते वायदा कभी धन बढ़ाने का ।।

चलन में है भ्रष्‍टाचार, संवैधानिक दर्जा है भ्रष्‍टाचार का, इन्‍हें संरक्षण दे, फलीभूत कर, कमाऊ पूत हैं देश के ये कर्णधार ।

इनसे मिल कर चलेगा, अखबार चलेगा, वरना कागज के कोटे को तरस जायेगा, इनके साथ चल विज्ञापन बटोर उठ पागल उठ चलो अखबार निकालो ।।

गोया मामला जरा ज्‍यादा लम्‍बा होता जा रहा है, हम बस इतना कहना चाहते हैं कि प्रसिद्ध मशहूर अखबार कहीं चूक गया, तथ्‍यात्‍मक त्रुटि कर गया चाहे विज्ञापन के चक्‍कर में यह प्रायोजित समाचार प्रकाशन हुआ हो चाहे विज्ञापनार्थ मक्‍खनबाजी के चक्‍कर में चूक गंभीर व अक्षम्‍य है । सही तथ्‍य निम्‍न प्रकार हैं

चम्‍बल विकास प्राधिकरण लगभग 25 -27 साल पहले जब मोतीलाल वोरा म.प्र. के मुख्‍यमंत्री बने, उससे पूर्व जब अर्जुन सिंह म.प्र. के मुख्‍यमंत्री थे, तब तत्‍कालीन मुख्‍यमंत्री अर्जुन सिंह ने भिण्‍ड व मुरैना के नगर सुधार न्‍यासों की स्‍थापना की , और चम्‍बल विकास प्राधिकरण का गठन किया । जिसमें स्‍थानीय समस्‍त विधायक, सांसद, जिले के मंत्रीगण, प्रभारी मंत्रीगण तथा तमाम सरकारी अफसरान इसके सदस्‍य हैं । यह वर्तमान में अस्तित्‍व में है । इसकी कुछ बैठकों में मुझे अपनी बुआ के लड़के (जो तत्‍समय भिण्‍ड के विधायक व म.प्र. शासन के मंत्री होकर मुरैना जिला के प्रभारी मंत्री भी रहे) के साथ दो चार बैठकों में शामिल होने का सौभाग्‍य नसीब हुआ । इसके अलावा चम्‍बल कम्श्र्निर का कार्यालय इसका मुख्‍यालय है, वहीं इसकी बैठके होतीं आईं हैं, चम्‍बल विकास प्राधिकरण की बैठकों की कई फाइलें मुझे पढने को नसीब हुयीं हैं ।

इस पूर्व गठित चम्‍बल विकास प्राधिकरण को कभी भंग किया गया हो यह सूचना मेरे मस्तिष्‍क में नहीं है, इस प्राधिकरण और इसकी गतिविधियों पर सरकार करोड़ों रूपये पहले ही खर्च कर चुकी है, मेरी सूचना के मुताबिक अभी भी यह अस्तित्‍व में हैं, प्रश्‍न यह है कि क्‍या एक प्राधिकरण के अस्तित्‍व में रहते उसी प्राधिकरण का गठन दोबारा किया जा सकता है । पुनर्गठन तो सम्‍भव है ले‍किन गठन सम्‍भव नहीं है, मगर खबर गठन के बारे में है । हैरत अंगेज है । अगर नहीं है तो जो करोड़ों पहले खर्च हो चके हैं उसका हिसाब किताब कहॉं गया, क्‍या गरीब की जेब में एक सूराख और बना दिया ।

मामला ठीक उन पर्यावरण क्‍लबों की तरह जिनका गठन सन् 2001 में भारत सरकार की नेशनल ग्रीन कोर (एन.जी.सी.) योजना के तहत म.प्र. शासन ने बाकायदा आदेश जारी करके किया, यह पर्यावरण लम्‍बे समय तक चले भी और पिछले साल तक मुरैना जिले में पढ़ने वाले हर स्‍कूली छात्र से 6 रू प्रति छात्र परिचय पत्र का तथा 5 रू प्रति छात्र पर्यावरण क्‍लब की सदस्‍यता शुल्‍क का वसूलते रहे, मुरैना जिला में औसतन आठ लाख छात्र प्रतिवर्ष अध्‍ययनरत रहे इस हिसाब से 11 का आठ लाख में गुणा कर दीजिये, औसतन सालाना रकम बनती है 88 लाख रूपये, आठ साल तक बाकायदा आदेश निकाल कर (आदेश की प्रतियां और सम्‍बन्धित समस्‍त आदेश व दस्‍तावेजी साक्ष्‍य हमारे पास उपलब्‍ध हैं) जबरन बच्‍चों से पैसे वसूले जाते रहे, अब 88 लाख में फिर आठ का गुणा कर दीजिये 704 लाख रूपये यानि 7 करोड़ 8 लाख रूपये होते हैं । यह एक मोटा हिसाब और आंकड़ा है, असल छात्र संख्‍या और रकम इससे कई गुना अधिक है ।

कलेक्‍टर इस वसूली कमेटी का अध्‍यक्ष था, जिला शिक्षा अधिकारी सचिव । यह पैसा कहॉं जमा होता था कहां खर्च होता था किसी को नहीं पता, कोई मद नहीं फिर भी रकम आती थी, कहां जाती थी किसी को नहीं पता, (विस्‍तृत आलेख इस आपराधिक घटनाक्रम पर पृथक से छापेंगें) जब शिकवे शिकायतें हुयीं और जिला शिक्षा अधिकारी लगभग 10 करोड़ के घोटाले में फंस गये तो, जिला शिक्षा अधिकारी के साढ़ू तत्‍कालीन स्‍कूली शिक्षा मंत्री ने पर्यावरण क्‍लबों की स्‍थापना की घोषणा कर दी और कहा कि स्‍कूलों में पर्यावरण क्‍लब गठित किये जायेंगें । अखबारों में खबर छपी, और लोग भौंचक्‍के थे कि जो पर्यावरण क्‍लब आठ साल से चल रहे हैं, अस्तित्‍व में हैं, उनका गठन कैसे किया जायेगा । आज तक लोग इस राज को समझ नहीं पाये, और दस करोड़ के मामले को धूल में डाल दिया गया (सारा मामला डाक्‍यूमेण्‍ट्री एविडेन्‍सेज, फोटोग्राफ्स, वीडियो फिल्‍मों पर सिद्ध है, ये रहस्‍य हम आगे चल कर खोलेंगे)

गुरुवार, 21 अगस्त 2008

गुरूवास्‍य दिवस: पुन: ब्‍लैक डे अभवत्, बिजली सप्‍लाई डम्‍पो अभवत्, लेट नाइट तक बिजली गुलो अभवत् शुक्रवारस्‍य मार्निंग पुन: ब्‍लैक: अभवत:, अंधेरा कायम जय श्री राम

गुरूवास्‍य दिवस: पुन: ब्‍लैक डे अभवत्, बिजली सप्‍लाई डम्‍पो अभवत्, लेट नाइट तक बिजली गुलो अभवत् शुक्रवारस्‍य मार्निंग पुन: ब्‍लैक: अभवत:, अंधेरा कायम जय श्री राम

 

मुरैना 22 अगस्‍त 08, दिन रात्रि, सुबह सायं शिवराजस्‍य सरकार बिजली घर सप्‍लाई पूर्णत: डम्‍पो अभवत ।

गुरूवारस्‍य दिवस अगेन कालदिवस च कालरात्रि सिद्धो अभवत् । जनता अति प्रसन्‍नता व्‍यकित करोति, धन्‍यवाद च ।

बेस्‍ट लाइफ, फील गुड और मध्‍यप्रदेशस्‍य 1 नंबर राज्‍य कल्‍पना साकार: भवति । गुरूवारस्‍य दिवस प्रात: 5 बजे बिजली कटौती प्रारंभ भवोति, निरन्‍तर कन्‍टीन्‍यूड अप टू लेट नाइटस्‍य रात्रि साढ़े 9 बजे तक ।

अद्यदिवस शुक्रवारस्‍य आलसो ब्‍लैक फ्राइडे काल्‍ड डयू टू, शुक्रवारस्‍य प्रात: साढ़े पॉंजे बजे कटौती ऑफ बिजली चालू अभवत् । नाऊ इट इज अण्‍डर वेट एण्‍ड वाच व्‍हाट विल हैपन फुल आफ शुक्रवारस्‍य डे ।

थैंक्‍यू सरकार साहब: बस दो महीना ओर अंधेरे का राज कायम रखें, फिर परमानेण्‍ट अंधेरास्‍य राज्‍य स्‍थपितो भविष्‍यति । जय श्री राम, जय अमरनाथ । परमाणु करार: मुर्दाबाद ।           

 

मंगलवार, 29 जुलाई 2008

हास्‍य/व्‍यंग्‍य जहँ जहँ चरण पड़े सन्‍तन के, तहँ तहँ बंटाढार भये...... नरेन्‍द्र सिंह तोमर ''आनन्‍द''

हास्‍य/व्‍यंग्‍य

जहँ जहँ चरण पड़े सन्‍तन के, तहँ तहँ बंटाढार भये......

नरेन्‍द्र सिंह तोमर ''आनन्‍द''

गोया किस्‍मत को किसी से दुश्‍मनी हो तो क्‍या कहिये । अपने मुरैना पुलिस में एक मंझले सिपाही (हमारे लालू प्रसाद जी सी.एस.पी. कों मंझला सिपाही बोला करते हैं) के न जाने दिन खोटे हैं, कि न जाने ग्रह हाथ धो कर या नहा धो कर उनके पीछे पड़ गये हैं ।

हमारे मंझले सिपाही की मेष राशि है, और मेष राशि में इन दिनों भारी उथलपुथल मची है । मेष राशि वाले अशोक अर्गल ने मेष राशि वाले ठाकुर अमर सिंह से पंगा ले लिया ।

अर्गल को मुरैना आना था, कैसे नहीं आते उनका घर जो दत्‍तपुरा में ठहरा । हमारे कलेक्‍टर साहब ने आफ्टर उपद्रव ठोक ठोक (क्‍या ठोका ये न पूछिये) के कहा कि अरे भाई उनका घर है घर भी नहीं आने दोगे क्‍या ।

टी.आई. के.डी.सोनकिया ने भी जम कर ठोक पीट (क्‍या ठोका पीटा ये न पूछिये) कर कहा ठोक दो सालों पर, हरामजादों पर मामले, इतना भीतर डाल दो कि साले जनम भर याद करें, करो भीतर निकलने नहीं चाहिये बाहर ।

अब भईया अर्गल मो भभ्‍भर मचा आया दिल्‍ली में, हमने भी देखा था टी.वी. पर कइसा नोट लहरा रहा था, इण्‍टरनेशनल हस्‍ती बन रहा था, सरकार गिरा रहा था । पठ्ठे ने ऐसे नोट हवा में उछाले थे जैसे ससुरे एक करोड़ नहीं एक एक के सौ नोट हों, अइसे फेंक आया संसद में जैसे ऐसे और इजने नोटों का तकिया तो उसके नौकर भी नहीं लगाते हों ।

अर्गल पर उस बखत पूरे मुरैना को भयंकर गुस्‍सा आया, लोग बोले, जे तो पगलियाय गयो (ये तो पागल हो गया है) जे तो नोट ऐसे दिखाय रहो है जैसे पैसा कछू होतुई नानें (ये तो नोट इस तरह दिखा रहा है जैसे पैसा कुछ होता ही नहीं ) झां सारो सौ सौ पचास पचास कें काजें मत्‍तो, अब जि करोड़नि फेंकवे चिपटो ऐ । अये ला हमनिई दे दे, अये जा में ते दस लाखई दे दे तो हम तर जागें, अये पागल मुरैना लिआ दस बीसनि के भले हें जागें ।

खैर ये तो '' सीन ऑफ इवेण्‍ट जस्‍ट हैपन्‍ड'' था ।

पर अर्गल दिल्‍ली में क्‍या कर आये, ये उतना महत्‍वपूर्ण नहीं था, खास बात थी कि अब चम्‍बल में क्‍या करेंगें ।

चम्‍बल में जल्‍दी ही अर्गल आउट ऑफ डेट यानि एक्‍सपायर्ड डेट की दवा बन जायेगें । दर असल अर्गल रिजर्व कोटे के हैं, वे बकाया दोंनों भी रिजर्व कोटे से आते हैं जो अर्गल काण्‍ड में शामिल थे । और अब इनकी सीटें नये परिसीमन में खत्‍म होकर सामान्‍य हों गयीं हैं । अब ये अपने अंतिम कार्यकाल की अंतिम घडि़यां गिन रहे हैं । वह तो भला हो यूपीए सरकार का कि इन एक्‍सपायर हो रहे सांसद महोदय के संसदीय दिये में तेल डाल कर कुछ और दिनों का जीवन दान दे दिया वरना अब तक तो एक्‍स्‍पायर हो चुके होते । और अंतकाल प्राप्‍त सांसद सूची में दर्ज हो गये होते ।

पर ये भी उतना महत्‍वपूर्ण नहीं था कि अर्गल का करेंगें । महत्‍वपूर्ण था कि अर्गल मुरैना आयेंगें तो का होगा ।

लोग अर्गल को पूजेंगें कि पन्हियायेंगें । ये टेंशन तो सबको ही खाये जा रहा था । ऊपर से अर्गल की अगवानी के लिये कांग्रेस ने मुँह काला करने का और समाजवादी वालों ने जूतों से मारने का ऐलान करके इस टेंशन का ब्‍लडप्रेशर बहुत हाई कर दिया था । शहर को टेंशन, जिले को टेंशन, चम्‍बल को टेंशन, म.प्र. को टेंशन, प्रशासन को टेंशन, पुलिस को टेंशन, और पत्रकारों को वैसे ही चौबीस घण्‍टे टेंशन रहता है अबकी बार फिर टेंशन ।

टेंशन में टेंशन तब ज्‍यादा हो गया जब मुरैना के मंझले सिपाही को उसी के उसी दिन चार्ज दिलाया गया, अब कहावत है कि जहँ जहँ चरण पड़े सन्‍तन के..... इधर मंझले सिपाही ने चार्ज लिया उधर अर्गल का आगमन हो गया ।

पहले पहाड़गढ़ में पंगा कर आये थे, ठाकुरों के दुश्‍मन नंबर एक हैं, ठाकुर नजर आते ही मंझले सिपाही की ऑंखों में खून खौल जाता है, और उसका एनकाउण्‍टर ठोक देते हैं, ठाकुर तो समूची सरकार के ही दुश्‍मन हैं, एक दिन पहले चम्‍बल से सारे ठाकुर अफसर और कर्मचारी हटा दिये गये,बाद बकाया सस्‍पैण्‍ड कर डाले, दूसरे दिन ही तीन दर्जन ठाकुरों (तंवरघारीयों) को जिला बदर की सूची निकाल डाली, सो ठाकुर विरोधीयों को तो चार्ज ए बादशाही होना ही थी, यह हैरत की बात नहीं थी । हैरत की बात ये थी कि पठ्ठे ने चार्ज लिया और पंगा भी हुआ और दंगा भी ।

कांग्रेस में जितने भी ठाकुर थे सबके खिलाफ आनन फानन में अपराध भी दर्ज कर दिये । मजे की बात ये कि सबमें अधिकांश लगभग 90 फीसदी ठाकुर ही मुल्जिम बने ।

शहर कोतवाल साहब पहले से ही ठाकुरों के दुश्‍मन थे अब मंझले सिपाही भी ठाकुरों के दुश्‍मन तो जो होना था, अगर शिल्‍पा शेट्टी की सभ्‍य भाषा में कहें तो '' जरा ज्‍यादा ही हो गया ''

पर हमारे मंझले सिपाही का कोई पैर तो देखो, साला कई महीनों से भारी चल रहा है, उनका पॉव भारी होना पूरे पुलिस डिपार्टमेण्‍ट के लिये मुसीबत बन गया है, वे जहॉं भी पॉंव धरते हैं पंगा और दंगा अपने आप ही हो जाता है । बेचारे इतने समय से बगैर नहाये धोये, बगैर मंजन अंजन के घूम रहे हैं कोई तो इलाज बताईये ।

शनिवार, 12 जुलाई 2008

हास्‍य /व्‍यंग्‍य सारा दिन सताते हो, रातों को जगाते हो .... बिजली का त्रिताल और कहरवा जारी, शिव का यह कऊनसा नृत्‍य है

हास्‍य /व्‍यंग्‍य

सारा दिन सताते हो, रातों को जगाते हो .... बिजली का त्रिताल और कहरवा जारी, शिव का यह कऊनसा नृत्‍य है

नरेन्‍द्र सिंह तोमर 'आनन्‍द'

जितेन्‍द्र भाई की एक फिल्‍म का एक गीत है, सारा दिन सताते हो, रातों को जगाते हो, तुम याद बहुत आते हो, इसमें एक लाइन और जोड़ दो तुम गाली खूब खाते हो बस बन गया म.प्र. का हाल ए सूरत । त्रिताल और कहरवा संगीत में तबले या ढोल‍क की ताल होती हैं

अब सुनो कैसे-    

 

एक नेताजी पूरा गला फाड़ के नर्रा रहे थे, कह रहे थे शिव ने ये किया शिव ने वो किया, शिव ने त्रिताल किया शिव ने कहरवा किया, लोगों को घर बेटा हो तो राम भरोसे और बेटी हो तो शिव भरोसे वगैरह वगैरह । पूरा टेंटुआ फाड़ने के बाद भी पण्डित जी की जनता की जमात में सुनवाई नहीं हो रही थी । सीन जम नहीं पा रिया था, मौसम बन नहीं पा रिया था । नेताजी के माथे से पसीना चू रहा था उनकी बाबा रामदेव जैसी काली दाढ़ी से पसीने की धार बहने लगी थी, गोया जनता थी कि तवज्‍जो ही नहीं दे रही थी, चारों ओर चें पों चें पों मची थी ।

मामला था जौरा का, जहॉं सी.एम. और राजनाथ सिंह आने वाले थे । सीन जम नहीं पाने से नेताजी खिसिया रहे थे, उनके हाव भाव बता रहे थे कि वे कित्‍ती इम्‍पोर्टेंट बात कह रहे हैं और ससुरी बेवकूफ पब्लिक सुन ही नहीं रही हैं । नेताजी के महान उद्गारों से मूरख पब्लिक वंचित हो रही है । घुमा फिरा कर वे यह कहना भी नहीं चूक रहे थे कि पता नहीं कब कौन भावी सी.एम. या पी.एम. हो, तब याद आयेगी कि एक भावी सी.एम. या पी.एम. जौरे में बोल गया निपट मूरख सिकरवारी के लोग उसे सुन नहीं पाये, उसके अनमोल वचनों को कैच नहीं कर पाये ।

वे सब पर बोल रहे थे पर बिजली पर नहीं बोल रहे थे, आतंक राज और भय राज पर नहीं बोल रहे थे केवल शिवराज पर बोल रहे थे, पब्लिक सुन नहीं रही थी, सुनने और बोलने में एक गैप था एक डिफ्रेन्‍स था, खिंच रहा था खत्‍म नहीं हो रहा था । जित्‍ता टैम शिवराज और राजनाथ को आने पहुँचने में लग रहा था उत्‍ता पण्डितजी का फिलर भाषण लम्‍बा खिंच रहा था, वे भी बोलते बोलते उकता चुके थे, कभी घड़ी देखते थे कभी आसमान की ओर मुँह उठा कर कुत्‍ते की तरह कान खड़े कर शिवराज और राजनाथ के पुष्‍पक विमान की घड़घड़ाहट टटोलते । पर शिव और राज (शिवराज और राजनाथ) दोनों लापता थे, टैम बढ़ता जा रिया था, और दोनो पठठे जाने कहॉं अटक गये थे, जैसे पूरा टाइम गटक गये थे । नेताजी ने आखिरकार भाषण का ऑरिजनल फिलर कोटा खत्‍म होते ही पिछले सरकार के टैम के भाषण शुरू कर दिया और पहुँच गये स्‍व. इन्दिरा गांधी के ओल्‍ड एज में (एज ऑफ इमरजेन्‍सी) बोले नेता जी इन्दिरा जी ने कही हती कि एक ही जादू , कड़ी मेहनत, पक्‍का इरादा, दूरदृष्टि वगैरह वगैरह अब वे इसकी पण्डिताई वाली व्‍याख्‍या में जुट बैठे ।

वे उतारना तो कांग्रेस की चाह रहे थे लेकिन वे भूल गये और इसकी निन्‍दात्‍मक व्‍याख्‍या करते करते प्रदेश की भाजपा सरकार को धोना शुरू कर दिया । उन्‍हें ध्‍यान ही नहीं रहा कि इस समय प्रदेश में कांग्रेस की नहीं भाजपा की सरकार है । और बोले कि भ्रष्‍टाचार और रिश्‍वत का एक ही जादू है जो कि सरकार कर रही है पहला भ्रष्‍टाचार और रिश्‍वत के लिये दूरदृष्टि रखो, सरकार में बैठे मंत्री और अफसरों को हिदायत है कि कहॉं कहॉं से कैसे कैसे कमाई हो सकती है इसके लिये दूरदृष्टि रखों, फिर बोले कि ठिकाने पता लगते ही कड़ी मेहनत करो और भ्रष्‍टाचार और रिश्‍वत के लिये जम कर कड़ी मेहनत करो, फिर बोले तीसरी बात है पक्‍का इरादा यानि पक्‍का इरादा रखो कि सबकी यानि जनता की ठेसनी है यानि जम कर भ्रष्‍टाचार करना हे और रिश्‍वत ऐंठनी हैं । उनकी इन्‍टरेस्टिंग और मनभावन बातें सुन कर पब्लिक के कान खड़े हो गये, और पिन ड्राप सायलेन्‍स छा गया सब अब नेताजी को सुनने लगे ।

नेताजी भी जनता की नब्‍ज पकड़ गये और समझ गये कि सरकार की बुराई करो तो जनता सुनती है वरना कोई घास भी नहीं डालता, नेताजी को अब जोश आने लगा और पण्डित जी के नेताई तेवर लौटने लगे । मगर अफसोस जैसे ही नेता पण्डित जी का मौसम बनना शरू हुआ तब तक आसमान से घड़घड़ की आवाज आयी मजबूरी में नेताजी को माइक से हटना पड़ा ।

शिव आ गये पर राज नहीं आयें । (हम जैसो गुरूघण्‍टालों को पहले से ही पता था कि अकेले शिव आयेंगें राज नहीं आयेंगे ) नेता लोग जनता को बहला फुसला रहे थे कि राज के पुष्‍पक विमान का ए.सी. फेल हो गया सो नहीं आ पाये, हम मुस्‍करा रहे थे, हमने अपने साथ वालों को पहले ही बता दिया था कि अब तो अकेले शिव ही आयेंगें राज नहीं आयेंगें ।

लोग हमें मान गये, जान गये वाह क्‍या भविष्‍यवाणी करता है पठठा । गोया हुआ ये कि बिजली पर कोई बोला हो न बोला हो पर शिवराज सिंह बोले, बिना लाग लपेट खुलकर बोले, रियलाइज किया माफी मांगीं और घिघियाये कि हॉं हम बिजली नहीं दे पाये इसका हमें ओपन दुख है हम इसके लिये गलतीशुदा हैं माफी मांगते हैं लेकिन अगर वर्षा अच्‍छी हुयी और हमारे बांधो में पानी आ गया तो मेरा वायदा है मैं आपको चौबीसों घण्‍टे बिजली दूंगा, यह मेरी गारण्‍टी है ।

भईया शिवराज साइकिल वाले, जब कांग्रेस की सरकार मध्‍यप्रदेश में थी तो तुम्‍हारी भाजपा लालटेन टांग कर (राष्‍ट्रीय जनता दल का चुनाव चिह्न) घूमती थी और लालटेन रैली लालटेन यात्रा निकाला करती थी, अब यार सरकार में आकर पार्टी चेन्‍ज कर समाजवादी पार्टी की साइकिल हथिया लिये हो, गलत बात है ये, बहुत नाइन्‍साफी है । यार भईया शिवराज साइकिल वाले, क्‍यों समाजवादी पार्टी और राष्‍ट्रीय जनता दल के पीछे पड़े रहते हो उन्‍हीं के चुनाव चिह्न अगर इत्‍ते काम के हैं तो यार ज्‍वाइन क्‍यों नहीं कर लेते सपा या राजद । ससुरा कमल किसी काम की नहीं, जब कहीं काम ही नहीं आता तो फेंको ससुरे को, न तो पेट्रोल बचाने के काम का न बिजली समस्‍या बताने का न और किसी मतलब का । क्‍या यार बाहियात चिह्न है । इससे तो कांग्रेस का पंजा ठीक है कम से कम सभाओं में हाथ उठा कर दिखा तो देते हो । मैं एक दिन फोटो चेक कर रहा था, आपका पंजा हिलता देख मैं समझा शायद कांग्रेस ज्‍वाइन कर लिये हो और लोगों को हाथ का पंजा दिखा कर कांग्रेस के लिये वोट की अपील कर रहे हो । वैसे साइकिल से पेट्रोल बचा कर हेलीकॉप्‍टर में भरवा लेते हो गलत बात है ये, सरासर गलत । 

खैर मैं तो अर्ज ये कर रहा था हुजूर कि आपके वायदे के मुताबिक अब तो ताल तलैया पोखर डबरा, बांध बंधैये सब के सब छकाछक्‍क भर कर ओवर फ्लो मार रहे हैं, पर बिजली अब भी काहे नहीं आयी है । सारा दिन सताते हो, रातों को जगाते हो , तुम याद बहुत आते हो । दिग्विजय सिंह से भी ज्‍यादा । इत्‍ती काटनी थी तो यार दिग्‍गी को ही बना रहने देते कम से कम कह बता के तो काटता था । और टैम पता रहता था कि कब सोना है कब जागना है, कब कम्‍प्‍यूटर बन्‍द करना है कब चालू करना है । तुम्‍हारा तो ठीया ही नहीं है । अरे भईया बांध तो भर गये अब का कर रहे हो सो बताओ । या ये वायदा भी 370 खत्‍म करने या मन्दिर बनवाने जैसा ही है । जैसी भी हो थोड़ा लिखा बहुत समझना, रोटी खाओ तो, पानी बिजली आने के बाद ही पीना ।

गुरुवार, 10 जुलाई 2008

हास्‍य/व्‍यंग्‍य आज मोहब्‍बत बन्‍द है- एम.पी. पुलिस : कल्‍ला के बाद अमरनाथ का भी कर डाला फर्जी एनकाउण्‍टर

हास्‍य/व्‍यंग्‍य

आज मोहब्‍बत बन्‍द है- एम.पी. पुलिस : कल्‍ला के बाद अमरनाथ का भी कर डाला फर्जी एनकाउण्‍टर

नरेन्‍द्र सिंह तोमर ''आनन्‍द''

जैसे जैसे मध्‍यप्रदेश के विधानसभा चुनाव नजदीक आते जा रहे हैं, वैसे वैसे राजनीतिक नूराकुश्‍ती बढ़ती जा रही है, मामला इस हद तक है कि यदि मुद्दा है तो है, नहीं है तो वो भी मुद्दा है । यदि कुछ नहीं है तो मुद्दे गये तेल लेने ससुरा पुतला तो फूं‍क ही डालो ।

कई साल पहले एक फिल्‍म आयी थी नाम था आपकी कसम, फिल्‍म की खास बात थी कि उसके दो गाने बड़े हिट और फिट हैं एक तो 'आज मोब्‍बत बन्‍द है ' दूसरा 'जय जय शिव शंकर, कांटा लगे न कंकर' जरा देखिये इन दो गीतों ने भारत का भविष्‍य ही बता डाला था । 

अभी हाल ही में भाजपा ने बन्‍द करवा डाला, आजकल बन्‍द तो रोजमर्रा के जीवन का अहम हिस्‍सा बन गया है, मध्‍यप्रदेश विशेषकर चम्‍बलवासी हफ्ते में दो तीन दिन बन्‍द का आनंद लेते ही रहते हैं, कभी क्षत्रिय समाज का बन्‍द तो कभी मीणा समुदाय का बन्‍द, कभी ब्राह्मण बन्‍द कराते हैं तो कभी बनिये बन्‍द करा देते हैं, गूजरो ने तो थोक बन्‍द ही करा दिया, कभी कांग्रेस का बन्‍द तो कभी भाजपा का बन्‍द, कभी माकपा का तो कभी भाकपा का कभी सपा का तो कभी बसपा का । ससुरी जित्‍ती जाति हैं जित्‍ते धर्म हैं, जित्‍ते सम्‍प्रदाय हैं, जित्‍ते राजनीतिक दल हैं । सबके सब बन्‍द कराने पर तुल बैठे हैं । जो आवे सो बोले हैं बन्‍द । बन्‍द बन्‍द बन्‍द ।

बनिया सबसे डरता है, व्‍यापारी सबसे घबराता है, दूकानदार सबसे घिघियाता है, गली का कुत्‍ता भी चिल्‍ला दे कि आज बन्‍द तो पूरा समूचा मार्केट अपने आप बन्‍द हो लेता है । बन्‍द नहीं करा तो नुकसान, तोड़ फोड़, लूट लपाट और बेइज्‍जती । बन्‍द करा तो नुकसान । सो लोगों ने आदत डाल ली है कि हफ्ते में अब श्रम विभाग और दूकानदारी अधिनियम की एक छुट्टी के अलावा दो तीन छुट्टी और पड़नी हैं ।

बन्‍द कराना नेताओं का एक क्षत्र अधिकार है, नेता चाहे समाज का हो या राजनीति का सबसे पहले बन्‍द मांगता । बिना बन्‍द लगता ही नहीं कि कुछ हुआ । पता ही नहीं चलता कि कहीं किसी चीज का विरोध हो रहा है या आन्‍दोलन हो रहा है । बन्‍द जीवन का अविभाज्‍य अंग और भारतीय लोकतंत्र की अवधारणा है ।

बन्‍द पर टिके इस भारत के भविष्‍य के बारे में एक और मजेदार बात यह है कि लोग बाजार बन्‍द कर लेते हैं अपनी दूकानों के शटर डाल कर रखते हैं लेकिन उन्‍हें यह नहीं पता होता कि आज किस बात का बन्‍द है, बस पूछो तो कहते हैं कि आज बीजेपी का बन्‍द है आज कांग्रेस का या आज अलां का या फलां का ।

भाजपा ने काहे को बन्‍द कराया था मुरैना वाले बहुतेरो को नहीं पता (असल में बहुत बाद तक मुझे भी नहीं पता था) , मैंने कुछ दूकानदारों से पूछा कि ये कायका बन्‍द था । दूकानदार बोले पता नहीं बीजेपी का बन्‍द था, अमरनाथ अमरनाथ चिल्‍ला रहे थे, समझ नहीं आया कि अमरनाथ को किसने एनकाउण्‍टर कर दिया, कल्‍ला सिकरवार का तो पता है लेकिन ये अमरनाथ पता नहीं किसने ठोक दिया, शायद कांग्रेसीयों ने एनकाउण्‍टर करा होगा तभी बन्‍द करा रहे होंगें । मैंने अपने पुलिस मुखबिरों को फोन लगाया कि भईये ये अमरनाथ का एनकाउण्‍टर किसने कर दिया है बड़ा बन्‍द बन्‍द चल रहा है, मेरे पुलिस मुखबिर मित्र घबराये और बोले गुरू अगर अमरनाथ का भी फर्जी एनकाउण्‍टर हुआ है तो जरूर अमृत लाल मीणा ने ठोका होगा या फिर कैलारस या सबलगढ़ पुलिस ने ठोक दिया होगा । आप सीधे वहीं एस.डी.ओ.पी. को लगा लो । मैंने कई एस.डी.ओ.पी. और टी.आई. से खबर की पुष्टि और विवरण चाहा ससुरे सब के सब धुत्‍त और मस्‍त थे, हर कोई कहता था हमारे थाने के रोजनामचे में नहीं है, दादा जरूर अमृत मीणा ने ठोका होगा । हमारे यहॉं तो पन्‍द्रह दिन बाद रामसहाय गूजर गिरोह के चार आदमी ठोकने हैं, ये अमरनाथ फमरनाथ हमारे थाने के एरिया में कोई वारदात नहीं करता, और न उस पर कोई रिवार्ड है । ग्‍वालियर पुलिस से पूछ कर देख लो शायद टी- अलां फलां पर दर्ज हो, हो सकता है इण्‍टरनेशनल मुजरिम रहा हो और इण्‍टरपोल का रेड कार्नर हो । मैं फोन पर पैसे खर्च कर कर के  और माथा पटक पटक के परेशान था मगर खबर थी कि मिल ही नहीं रही थी ।    

खुद मैंने समझा कि कोई भाजपा नेता अमरनाथ होगा सो उसका भी पुलिस ने कल्‍ला सिकरवार की तरह फर्जी एनकाउण्‍टर कर डाला होगा तो बीजेपी भी क्षत्रिय महासभा की तरह बन्‍द करा रही होगी ।  लेकिन जब पलटकर कांग्रेसीयों ने लफड़ा किया और इन्‍दौर भोपाल में सरकार को रगड़ा तो मुझे टेंशन हुआ कि यार इसका मतलब अमरनाथ कोई ज्‍यादा बड़ा नेता था सो ज्‍यादा भभ्‍भर मच रहा है, मुझे इस बात पर भी शर्म आ रही थी कि इतना बड़ा नेता फर्जी एनकाउण्‍टर हो गया और मैं उसका नाम तक नहीं जानता । उफ मुझे तो डूब ही मरना चाहिये । मैं लालकृष्‍ण से शिवराज तक को जानता हूँ पर अमरनाथ को नहीं जानता, मैंने ठान लिया कि हम मीडिया में काम नहीं कर रहे झकमारी कर रहे हैं, बन्‍द आज से लिखना बन्‍द । सब बाजार बन्‍द कर रहे हैं, अमरनाथ बेचारा कोई बहुत बड़ा बढि़या आदमी होगा निबटा दिया इन पुलिस वालों ने बेचारे को, और हमें कानोंकान खबर भी नहीं हुयी, सो उनके बन्‍द के साथ अपना लिखना बन्‍द ।

बहुत बाद में मुझे पता चला कि मामला बाबा अमरनाथ का था, गुफा वाले अमरनाथ महादेव । अरे भईया वे तो अमर हैं, उन्‍हें कौन निबटा सकता है । पर बाबा को भी अब मीडिया में हाईलाइट होने का चस्‍का लग गया है, कभी लुप्‍त होकर, कभी गुप्‍त होकर तो कभी सुप्‍त होकर हर साल मीडिया की हेडलाइन में जगह पा ही लेते हैं अबकी बार बन्‍द करा कर राजनीति में भी तगड़ी एण्‍ट्री मारी है, हाहाकार और मारामार मचाते हुये, वाह बाबा वाह क्‍या धांसू एण्‍ट्री मारी है । राम जी ने भी मारी थी ऐसी ही धांसू एण्‍ट्री पर वे आउटडेटेड हो गये, बिना मन्दिर के ही क्‍लीन बोल्‍ड हो गये । दूध की मक्‍खी हो गये । बाबा तुम जरा देखना टंगड़ी बचा के खेलना, वरना चुनाव के बाद राम जी से बदतर हालत हो जायेगी । प्रभु आप तो अन्‍तर्यामी हैं, सब जानते हैं, फिर काहे को नेताओं के अण्‍टे में आके पार्टी ज्‍वाइन कर रहे हो, दूर ही रहो प्रभु । अभी सब पार्टी वाले आपके भक्‍त हैं आपके दर्शनों के जोखिम उठाते हैं फिर एक पार्टी को छोड़ दूसरा कोई तुम्‍हारा ना नाम लेवा होगा ना पानी देवा । सबके बने रहो इसी में बड़प्‍पन है । काहे को एक के नाम बदनाम होते हो । प्रभु आपका ठीया वहीं ठीक है, दिल्‍ली, भोपाल, इन्‍दौर से दूर ही रहो तो बेहतर हैं । 

रविवार, 6 जुलाई 2008

हास्‍य/व्‍यंग्‍य दिल पे जरा हाथ रख लो बाबू फिर गंगू बाई की चाल देखो... नरेन्‍द्र सिंह तोमर ‘आनन्‍द’

हास्‍य/व्‍यंग्‍य

दिल पे जरा हाथ रख लो बाबू फिर गंगू बाई की चाल देखो...

नरेन्‍द्र सिंह तोमर 'आनन्‍द' 

उल्‍टे रोजे गले पड़े 

               यूं तो कहावत ये भी है कि उल्‍टे बॉंस बरेली की ओर, लेकिन बात तो कहावत के फिट होने की है । किस्‍सा यूं हैं कि चम्‍बल में चार चोर निकले चोरी करने, रात का बखत था, पुलिस से भी सेटिंग बिठाई हुयी थी, तय था कि जो भी हाथ आयेगा उसमें से फिफ्टी फिफ्टी पुलिस बिटवीन थीव्‍ज डिस्‍ट्रीब्‍यूट होगा, पुलिस ने इस शर्त पर चोरों को चोरी का लायसेन्‍स दे दिया, और उनका कार्यक्षेत्र भी मुकम्‍मल तय कर दिया कि फलां गॉंव के फलॉं खेत से फलां खंती और फलां सड़क के दायरे में ही चोरी करोगे, उससे हट के दूसरे चोरों की सीमा शुरू होगी, दूसरों के एरिया में दखल नहीं दोगे, चोरों ने रजामन्‍दी के साथ लायसेन्‍स युक्‍त हो, अंधेरी रात में अपने शिकार की तलाश शुरू कर दी । चार चोरों में से एक ने जिस घर को ताक तूक कर नक्‍श पैमाना तय किया था, उस घर में उस दिन कोई नया बच्‍चा पैदा हो गया सो सारी रात घर में जागरण बना रहा । अब चोरों के सामने दिक्‍कत ये कि बड़ी मुश्किल से तो एक रात का लायसेन्‍स मिला, उस पर भी दॉंव खाली जा रहा था ।

मुश्किल में फंसे चारों चोर एक झुरमुट में बैठ कर बतियाने लगे, फुसफुसाये और विचार किया कि भैरों बाबा के मन्दिर पर चलते हैं, और वहॉं कुछ तलाशते हैं, कुछ हाथ लग ही जायेगा, और अगर किसी ने देख लिया तो कह देंगें, मन्दिर में भैरों बाबा के दर्शन करने आये हैं ।

चारों चोर भैरों बाबा के मन्दिर पहुँचे, गॉंव का मन्दिर था सो पट पटारी का झंझट नहीं था, एक चोर ने लपक कर बढि़या बड़े घण्‍टे आनन फानन में उतार लिये, दूसरे ने दान पेटी से चिल्‍लर बटोर ली, तीसरे ने मन्दिर के पुजारी के कमरे से काम की चीजें उठाई, पुजारी के कुर्ते की जेबें साफ कीं और चौथा बाहर पहरा देता रहा । काम तमाम कर माल लाद लूद कर चारों चोर खिसक लिये । अभी वे अपने गॉंव की ओर जा ही रहे थे, रास्‍ते में बीहड़ था, बीहड़ पार कर रहे थे कि तभी बगल की नरिया (बरसाती नाला) से आवाज आई, ठहर जाओ नहीं तो छप्‍पन गोली पार हो जायेंगीं । चोर थोड़ा सहमे, ठिठके, किन्‍तु फिर भी हिम्‍मत कर आगे बढ़े । तभी लगभग एक दर्जन लोगों ने उनके चारों ओर घेरा डाल दिया और चोरों को अपनी गिरफ्त में ले लिया । वे चोरों को पकड़ कर अपने अडडे पर अपने चीफ के पास ले गये । हालात और माजरा देख कर चोर समझ गये कि वे डकैतों के चंगुल में फंस चुके हैं ।

डकैतों ने उन चोरों की पकड़ कर ली, यानि अपहरण कर लिया । साथ ही उनके द्वारा चुराया सारा मालमत्‍ता, और जेवर पैसा भी जप्‍त कर लिया । चारों चोरों से दस दस लाख रूपये की फिरौती मांग डाली सो अलग । अब तो चोर भारी संकट में फंस गये ।

चोरों के घर वाले चोरों के घर वापस न पहुंचने से चिन्तित हो गये, पहले समझा कि शायद चोरी करते पकड़ गये होंगें, सो अपनी रिश्‍तेदारी यानि थाने पहुँचे, और दरोगा से बोले कि हमारे घर वाले तो लायसेन्‍स्‍ड चोर थे लेकिन अभी तक घर वापस नहीं पहुंचे, क्‍या वे पकड़े गये हैं । दरोगा ने रोजनामचा चेक किया और बोला नहीं इस थानें में तो उनकी गिरफ्तारी दर्ज नहीं हैं । किसी और थाने के एरिया में तो एण्‍ट्री नहीं मार दी ।

तब तक एक चोर की घरवाली के चोरी के मोबाइल पर घण्‍टी आ गयी, घण्‍टी उसके पति यानि चोर के चोरी वाले मोबाइल से आयी थी, वह बोली 'अजी कहॉं हो तुम, हम बड़े परेशान हैं, ढूंढ़ ढकोर रहे हैं, तुम थाने भी नहीं पहुँचे, दरोगा जी भी टेंशन में हैं, वे समझ रहे हैं कि तुम माल पैसा लेकर रफूचक्‍कर हो गये । चोर उधर से बोला अरी फेमिली, हम बड़े संकट में फंस गये हैं, चोरी तो मन्दिर से हमने कर ली थी और चालीस पचास हजार का माल भी हाथ लग गया था, लेकिन घर लौटते वक्‍त हमारा किडनेप हो गया है, और अब हमें छोड़ने के बदले डकैत दस लाख रूपये मांग रहे हैं । कैसे भी इंतजाम करके हमें छुड़वा लो । और फिर मोबाइल डिस्‍कनेक्‍ट हो गया ।

चोर की बीवी ने दरोगा को बताया कि हमारे हसबैण्‍ड का किडनैप हो गया है और वे बता रहे हैं कि चालीस पचास हजार का माल उनके पास था, चोरी के माल सहित वे किडनैप कर लिये गये हैं । अब कुछ भी करो उन्‍हें छुड़वाओ ।

दरोगा बोला लेकिन उनके एरिया से चोरी की रिपोर्ट तो 90 हजार की आयी है, मन्दिर के पुजारी ने 90 हजार कीमती का माल पैसा चोरी होना बताया है, हमने अभी रिपोर्ट नहीं लिखी है, आवेदन लेकर जॉंच में डाल दिया है । पर ये अपहरण का क्‍या किस्‍सा नाटक है । फिर जो भी हुआ आप समझ गये होंगें, फिरौती देकर अपहृत छूटे यानि उल्‍टे रोजे गले पड़े ।

 

गुरुवार, 22 मई 2008

सोच समझ कर थूकिये, थूक बड़ा अनमोल, लघुशंका भी कीजिये सोच समझ और तोल

सोच समझ कर थूकिये, थूक बड़ा अनमोल, लघुशंका भी कीजिये सोच समझ और तोल

नरेन्‍द्र सिंह तोमर ''आनन्‍द''

अभी आजकल ताजा खबर चल रही है , ग्‍वालियर नगर निगम ने थुक्‍का फजीहत बन्‍द कराने के लिये, थूकना प्रतिबन्धित कराने की जुगाड़ खोज ली है खबर कुछ इस प्रकार है -

थूकने के सौ रूपये, लघुशंका के ढाई सौ, दीर्घ शंका पॉच सौ में हो सकेगी 

 ग्वालियर दिनांक 21 मई 2008 - नागरिकों को सार्वजनिक स्थानों पर गंदगी फैलाने के लिये अब नगर निगम ग्वालियर द्वारा विभिन्न प्रकार के अर्थदण्ड निर्धारित कर दिये गये हैं । अब नागरिक सार्वजनिक स्थान पर थूकने पर 100/-, पेशाब करने पर 250/-, शौच करने पर 500/-, पशु को आवारा छोड़ने पर 1000/- तथा सार्वजनिक स्थानों पर रासायनिक अपशिष्ट डालने पर 1000/- रू., सार्वजनिक स्थानों पर हानिकारक द्रव्य बहाने 1000/- रू. तथा गंदगी फैलाने पर 2500/- से दण्0श्निडत हों सकेंगे।

निगमायुक्त डॉ. पवन शर्मा द्वारा दी गई जानकारी में बताया गया है कि म0प्र0 शासन, नगरीय प्रशासन के आदेश में स्पष्ट उल्लेख किया गया है कि नगर निगम क्षेत्र में अपशिष्ट प्रबंधन के उल्लंघन हेतु दाण्डिक प्रावधानों का पालन किया जावे, जिसके तहत सार्वजनिक स्थानों पर व्यक्ति दुकानदारों, संस्थानों, होटलों, फैक्ट्रीयों, रेस्टोरेंटों पर गंदगी फैलाई जाती है तो उनके खिलाफ म0प्र0 शासन नगरीय प्रशासन नियमों में आरोपित अर्थदण्ड से दण्डित किया जावेगा।

निगमायुक्त द्वारा जारी निर्देश में अपर आयुक्त समस्त उपायुक्त, सहायक आयुक्त, स्वास्थ्य अधिकारी, सहायक प्रभारी स्वास्थ्य एवं कचरा प्रबंधन अधिकारी निगम के चिकित्सा अधिकारी क्षेत्राधिकारियों ए.एस.आई. तथा दरोगा स्तर के अधिकारियों को क्षेत्रांतर्गत नियमों का उल्लंघन करने वाले व्यक्तियों, संस्थाओं, घरों, दुकानों, फैक्ट्रीयों के मालिकों जिनके द्वारा सार्वजनिक स्थलों पर गंदगी प्रदूषण उत्तेजक ठोस तथा द्रव्य पदार्थ कचरे के रूप में डाले जायेंगे। अधिसूचित क्षेत्रों को छोड़कर उनके विरूद्व उपरोक्तानुसार अर्थदण्ड लगाने के लिये अधिकृत किये गये हैं । उक्त प्राधिकृत अधिकारी अपने-अपने क्षेत्रांतर्गत नियमों का उल्लंघन करने वालों के विरूद्व अर्थदण्ड की कार्यवाही करेंगे तथा जुर्माना राशि की रसीद देंगे। साथ ही जुर्माने से वसूल की राशि 24 घण्टे के अंदर निगम कोष में जमा करावेंगे।

 

गोया कुछ दिनों से बड़ी थुक्‍का फजीहत चल रही थी, कोई भी कहीं भी आकर थूक जाता था, थूकना ग्‍वालियर के लिये टेंशन हो गया । कोई इस पर थूक रिया है, कोई उस पर थूक रिया है, कोई नेता जी पे थूक रिया है कोई पुलिस पे तो कोई सरकार पे । कोई कोई पठ्ठा तो नगर निगम पे ही डायरेक्‍ट थूक देता था । हुम्‍फ थूक थूक बेहाल कर दिया ग्‍वालियर को ।

ग्‍वालियर वालों की एक और पुरानी आदत है, बड़ी जल्‍दी लपक के ऊंगली छोड़ पहुँचा थाम लेते हैं, सो यह लाजमी था कि बात थूक से भी आगे बढ़ती, बढ़ते देर न लगती । प्राब्‍लम शुरू में ही फिक्‍स हो जाये तो बेहतर रहती है, कहावत है कि रोग बढ़ने से पहले इलाज बेहतर है, थुक्‍का थुक्‍की से आगे मामला जाये इससे पहले ही, सरकार बैठ गये चिन्‍तन, मन्‍थन और मनन में । नगर पालिका अधिनियम छान मारा, सारी धारायें खंगाल डालीं । और आखिर मिल ही गया अलादीन का चिरागी जिन्‍न, कि सार्वजनिक प्‍लेस पर गंदगी करना अपराध ए अधिनियम है । आई.पी.सी. में तो लघुशंका पे से ही मामला बनता है लेकिन नगरपालिका अधिनियम ने थूकने पर से ही मामला बनाने की राह सुझा दी । अफसरों की जान में जान आयी । गोया पॉंत में जात मिल गयी ।

थूका, मूता, या .....वगैरह वगैरह तो बेटा निबट जाओगे । अब अगर ग्‍वालियर में कहीं थूकना है तो बेटा जेब में सौ का एक नोट कड़कड़ाता हुआ डाल कर चलना । और मूतना है तो ढाई सौ के पत्‍ते कड़कड़ाते हुये जेब में होने चाहिये । वरना निहाल हो जाओगे ।

अगर आप सौ के कई नोट जेब में रख कर चलेंगे तो ग्‍वालियर में कई बार थूक सकेगे, आपकी जेब के नोटों की संख्‍या के अनुसार जम कर मूत भी सकेगे । यानि जेब में नोट हैं तो ग्‍वालियर में जम कर थूको और मूतो, वरना पतली गली से निकल लो ।

देश भर के थुकेरों और मुतेरों को ग्‍वालियर बुला रहा है, पैसा लाओ, थूको और मूतो ।

मेरे वकील मित्रों को यह खबर बड़ी बढि़या लगी, उनकी खुपडि़या घूमी बोले गुरू ये मामला जनहित में आ सकता है, मैं बोला कैसे, वे बोले कि अरे भईया ग्‍वालियर जाकर खांसी वाले, टी.बी. वाले इलाज कराते हैं, और थूकना उनके संग चलता है अब क्‍या उनको थूकदान संग ले जाना पड़ेगा या सार्वजनिक प्‍लेस पे अपने निजी थूकदान या पीकदान या मूतदान में कोई विसर्जन नहीं कर सकेगा, आदेश स्‍पष्‍ट नहीं है ।

मैंने कहा नहीं यार ये तो थुक्‍का थुक्‍की कर थुक्‍का फजीहत वालों के लिये आदेश है । जनरल पब्लिक के लिये नहीं है । लेकिन अब भई वकील तो वकील हैं, हर जगह कील ठोकना उनका पेशा है, लगी तो कील न लगी तो अपील, वकील साहब बोले कि गुरू, बात कुछ जँची नहीं, इस आदेश के मुतल्लिक तो सार्वजनिक प्‍लेस पर सब कुछ मना है, यानि सार्वजनिक मूत्रालय और सार्वजनिक शौचालय भी इसमें वर्जित प्‍लेस हो जाते हैं ।

मेरी खुपडि़या वकील साहब चेंट चेंट कर चाट गये, मुझे तो कोई समाधान नहीं सूझा, फिलहाल मुझे कोई टेंशन भी नहीं है, हमारे मुरैना में तो सब फ्री है, चाहे जहॉं चाहे जिस पर चाहे जितना थूको, नो टेंशन, चाहे जिधर बैठकर, खड़े होकर, चाहे जिस दिशा में निवृत्‍त हो लो नो टेंशन, थुक्‍कमथुक्‍क, दिशा मैदान, लघुशंका यहॉं सारे आइटम फ्री हैं, चाहे जिसके दरवाजे पर कर आओ । डायरेक्‍ट नगरपालिका पे भी कर दो, नो टेंशन । ग्‍वालियर वाले ग्‍वालियर की जाने, नो टेंशन ।