मंगलवार, 15 अप्रैल 2008

बाकी कुछ बचा सो मँहगाई मार गई ....आधी हकीकत आधा फसाना तेल देखो तेल की धार देखो

बाकी कुछ बचा सो मँहगाई मार गई ....आधी हकीकत आधा फसाना

कड़वा सच

नरेन्‍द्र सिंह तोमर ''आनन्‍द''

 

आज चारों ओर मंहगाई का हल्‍ला है, जिधर देखो उधर चिल्‍लपों मची है, सारे के सारे नेता गला फाड़ के नर्रा रहे हैं । नर्रा क्‍या डकरा रहे हैं, रोटी कपड़ा और मकान का गाना बजा रहे हैं बजा क्‍या जनता को सुना रहे हैं , देश का समूचा मीडिया महज भोंपू बन कर रह गया है, अरे भोंपू क्‍या सार्वजनिक मूत्रालय बन कर रह गया है, जो आता है टायलट कर जाता है, नेता छोटा हो चाहे बड़ा मीडिया भोंपू की तुरही में हल्‍की सी फूंक मार जाते हैं और मीडिया भनभना कर उनकी फूंक को सुर में बदल कर एम्‍पलीफाई कर देता है ।

धन्‍य है जगत नरायन, तुमसे तो नारद अच्‍छे थे, कम से कम खुद की कारीगरी तो दिखाते थे, अच्‍छे भले चलते फिरते मीडिया थे । अरे भईया माना विज्ञापन मजबूरी है लेकिन चारण भाट बन जाना तो मजबूरी नहीं हो सकती । जो सरकारों की सेवाओं में यस राजाओं (नेताओं) की चाटुकारिता में सवैये और कवित्‍त बॉंचने लगे ।

मंहगाई मंहगाई मंहगाई, कहॉं से आयी मंहगायी, बजट में तो कुछ नहीं बढ़ाया गया फिर ये मंहगाई कहॉं से आयी । जब बजट आने से तीन दिन पहले सारे बाजार का माल अण्‍डरग्राउण्‍ड हो गया था और सिगरेट माचिस जैसी चीजें ब्‍लैक में बिक रहीं थीं, तब कोई क्‍यों नहीं नर्राया मंहगाई मंहगाई ।

पिछले दस साल में जब सोने के दाम पॉंच हजार से पन्‍द्रह हजार तक आये तब कोई क्‍यों नहीं नर्राया मंहगाई मंहगाई मंहगाई । जब सरकारी अफसरों और नेताओं के वेतन भत्‍ते पिछले दस साल में दस दफे बढ़े तब कोई क्‍यों नहीं नर्राया मंहगाई मंहगाई मंहगाई ।

चम्‍बल घाटी का मुरैना जिला सरसों का सबसे बड़ा उत्‍पादक है, यहॉं सरसों के अखण्‍ड भण्‍डार हैं, सरसों से सरसब्‍ज इस जिले में जब सरसों का तेल 88 रूपये किलो बिका तो कोई क्‍यों नहीं नर्राया मंहगाई मंहगाई मंहगाई । सरसों के भण्‍डार तो आज भी इस जिले में किलो टनों में हैं, मगर किसान के यहॉं नहीं सेठजी के यहॉं, बावजूद इसके किसान के हाथ तो मुरैना जिला में अभी भी इतनी सरसों हैं कि कम से कम ग्‍वालियर चम्‍बल में तेल के दाम चौथाई पर ले आये । लेकिन सेठजी के गोदाम में तो सरसों के इतने अकूत भण्‍डार है ( किसे नहीं पता) कि सारे देश में तेल के दाम चौथाई करा दें ।

मुरैना से प्रतिदिन बाहर जाने वाले हजारों टन तेल को रूकवा क्‍यों नहीं देते नेता जी, अभी हाल पता चल जायेगा कि मंहगाई के पीछे असल राज क्‍या है । फिर नर्राना मंहगाई मंहगाई मंहगाई । पर कैसे रूकवाओगे नेताजी सेठ जी तो आपकी रिजर्व बैंक भी हैं और वोट बैंक भी । वही सेठजी तेल और सरसों दोनों को ब्‍लॉक कर के बैठे हैं महाराज ।

ये वही सेठ जी हैं गरीब के दुश्‍मन सेठों के मसीहा और नेताओं के रिजर्व बैंक, जिन्‍होंने चन्‍द साल पहले केन्‍द्र सरकार से खुले तेल की बिक्री पर रोक लगवा के अपने पाउचों में तेल बेचने की मंजूरी दिला ली थी, तब हम नर्राये थे खूब भभ्‍भर मचाया था और चम्‍बल के किसानों को उनके द्वारा ही पैदा की गयी सरसों का तेल खुद पिरवा कर खाने से रोकने और अपनी सरसों का तेल सेठ जी से पिरवा कर पाउच में तीन गुने जादा दामों पर खरीद कर खाने से हमने जैसे तैसे बचाया था । इसके चन्‍द सालों बाद सेठ जी ने फिर ड्राप्‍सी शिवपुरी जिले में फैलवायी थी और मुरैना के कलेक्‍टर से ऊपर ही ऊपर आर्डर निकलवा कर मुरैना जिला में खुले तेल की बिक्री बन्‍द करवाई थी तथा फिर पाउचों में तेल खपाया था, उस समय खुले बाजार में खुले तेल के दाम थे 28 रूपये किलो और सेठजी के पाउच का तेल था 70 रूपये  प्रति किलो, लोगों ने उस भ्रष्‍ट कलेक्‍टर के रहते मजबूरी में सेठ जी का तेल झेला, हमने फिर ऊधम भभ्‍भर मचाया और कलेक्‍टर बदलते ही सेठजी का आर्डर निरस्‍त कराया ।

सेठ जी के किसी जमाने में अर्जुन सिंह ( वर्तमान केन्‍द्रीय मंत्री) जीजा हुआ करते थे, उसके बाद दिग्विजय सिंह भी कुछ समय सेठ जी के जीजा बने रहे, आजकल रूस्‍तम सिंह (म.प्र. के पंचायत मंत्री ) उनके जीजा हैं या क्‍या हैं पता नहीं, मगर दोनों की जोड़ी धरम वीर जैसी जोड़ी है, इत्‍ता पता है ।

सात अजूबे इस दुनिया में आठवीं इनकी जोड़ी, तोड़े से भई टूटे ना ये धरमवीर की जोड़ी । मुझे ये गाना बहुत पसन्‍द है । और इस जोड़ी पर फिट भी है ।

सेठजी के गोदाम तेल और सरसों से लबालब हैं नेता जी, सेठजी किलो टनों में तेल रोजाना बाहर भी भेज रहे हैं, उससे ज्‍यादा अण्‍डरग्राउण्‍ड दबाये भी बैठे हैं । दम है तो रोको मंहगाई, सेठ जी का तेल म.प्र. में भी बंटवा दोगे तो प्‍यारे म.प्र. की मंहगाई गारण्‍टी से खत्‍म हो जायेगी । गारण्‍टी क्‍या चैलेन्‍ज से खत्‍म हो जायेगी । लो एक पता तो बता दिया करो कार्यवाही, इसके बाद फिर और कई पते बतायेंगे और भी माल बतायेंगे, हम घटवायेंगे मंहगाई करो कार्रवाई , फिर उसके बाद नर्राना मंहगाई मंहगाई मंहमाई ।  

सोमवार, 7 अप्रैल 2008

न नहाना ना धोना, मगन रहना, पूजो माता, बिजली पानी बिना, विद्युत राक्षस का माता के भक्‍तों पर हमला, लाखों चपेट में, राज्‍य संकट में

न नहाना ना धोना, मगन रहना, पूजो माता, बिजली पानी बिना, हिन्‍दू नवसंवत्‍सर पर हिन्‍दूओं को राज्‍य सरकार का तोहफा

विद्युत राक्षस का माता के भक्‍तों पर हमला, लाखों चपेट में, राज्‍य संकट में या देवी सर्वभूतेषु विद्युत रूपेण संस्थिता, नमस्‍तस्‍यै नमस्‍तस्‍यै नमस्‍तस्‍यै नमो नम :

मुरैना 7 अप्रेल 08, राज्‍य सरकार ने चैत्र शुक्‍ल प्रतिपदा हिन्‍दू नवसंवत्‍सर पर हिन्‍दूओं को तोहफा देते हुये सोमवार को सबेरे बिजली काट कर न केवल हिन्‍दूओं को ही उपकृत कर दिया बल्कि माता के भक्‍तों को बिना नहाये धोये और बिना जल भरे खाली कलशों के साथ माता की पूजा के लिये भी विवश कर दिया ।

उल्‍लेखनीय है कि कल रविवार से नवरात्र महोत्‍सव प्रारंभ हो चुका है और माता की प्रतिष्‍ठा स्‍थापना के साथ ही जवारे बो कर तथा जल घट स्‍थापना आदि करके, नियमित रूप से स्‍नान आदि से निवृत्‍त हो माला को जल स्‍नान, जल अर्पण एवं तर्पण आदि कर्म करते हैं । इसके साथ ही नौ रात्रि तक माता का निरन्‍तर जप अनुष्‍ठान, भजन पूजन आदि नियमित रूप से किया जाता है ।

अधिकांश लोगों द्वारा रविवार को ही माता की प्रतिष्‍ठा कर अर्चना अनुष्‍ठान प्रारंभ कर दिया गया था, कुछ लोग कतिपय समाचारपत्रीय भ्रम स्‍थापना के कारण इसका प्रारंभ आज सोमवार से कर रहे थे ।

खैर जो भी हो आज की बिजली दुर्गत सुबह सात बज कार 17 मिनिट से शुरू हुयी यानि सबेरे कटी बिजली ने अभी समाचार लिखे जाने के वक्‍त तक कुछ ऐसा कोहराम मचाया कि अब इसे ''विद्युत राक्षस'' की संज्ञा दी जाये तो कुछ भी अनुचित नहीं होगा ।

कुल मिला कर समाचार लिखे जाने और प्रकाशित किये जाने के वक्‍त तक बिजली बन्‍द थी, हॉं हर एक या दो घण्‍टे बाद जरूर महज 3 या 4 मिनिट के लिये अपनी झलक दिखलाती रही । यानि यूजलेस बिजली, बट बिजली वाज अवेलेबल, अब 3 या 4 मिनिट को आने वाली बिजली का कब कैसा कितना इस्‍तेमाल कर सकते हो कर लो बेटा, पूज लो माता, दे दिया राज्‍य सरकार ने नवसंवत्‍सर को तोहफा । यानि पहले ही दिन मस्‍त व शुभ आरम्‍भ । जय माता की ।।

''दुर्गा दुर्गत दूर कर '' यह पुराना भजन है, बत्‍तीस नाम माला में भी यह उल्‍लेखित है । केवल सिद्ध कुंजिका में संशोधन कर लिया जायेगा तो बात कुछ यूं बनेगी कि ''देवी के लिये ''विद्युत राक्षस'' का संहार परम अनिवार्य हो जायेगा ।

केन्‍द्र सरकार ने हिन्‍दू नव संवत्‍सर पर, सिंधिया जी को अंचल में मंत्री के रूप में जहॉं एक तोहफा दिया वहीं राज्‍य सरकार का तोहफा भी अंचल में खूब सराहा गया ।

जय भवानी, या देवी सर्वभूतेषु विद्युत रूपेण संस्थिता, नमस्‍तस्‍यै नमस्‍तस्‍यै नमस्‍तस्‍यै नमो नम :

रविवार, 30 मार्च 2008

हूँ.....लो हो गया एनकाउण्‍टर कर दिया शॉट डेड साले को

हास्‍य/व्‍यंग्‍य

हूँ.....लो हो गया एनकाउण्‍टर कर दिया शॉट डेड साले को

नरेन्‍द्र सिंह तोमर ''आनन्‍द''

शहर ए आजम इन दिनों तफरी पर हैं, उनका स्‍टाफ आजाद इन दिनों पूरी आजादी और लोकतंत्र का आनन्‍द ले रहा है । साहब के कार्यालय में इन दिनों मार्च क्‍लोजिंग चल रहा है, साहब को हुकुम मिला कि बजट पूरा निबटाना है, एक पाई भी सरैण्‍डर नहीं होनी चाहिये । निपटाओं कैसे भी कहीं भी ।

साहब और साहब के सैनिक हर साल कुछ पैसा सरैण्‍डर कर लौटाने के आदी थे और बजट सरैण्‍डर करना तथा पैसा वापस सरकार को भेजना उनकी सालानाचर्या का अहम भाग थी । वे इसे सरकारी पैसे की बचत मानते आये थे । पैसा लौटा कर छाती ठोक के सीना तान के अपनी तारीफ में खुद ही कशीदे बॉंच लिया करते थे ।

अबकी बार ससुरी मुसीबत हो गयी, सब उल्‍टा हो गया गुल गपाड़ा हो गया । ऊपर से आदेश हैं सरैण्‍डर नहीं एनकाउण्‍टर चाहिये, वापसी नहीं उपयोगिता प्रमाण चाहिये ।

रटी रटाई लाइनों पर ट्रेडीशनलीया स्‍टाइल में काम करने वाले सरकारी कार्यालय नये किस्‍म के आदेश से चक्‍कर में पड़ गये । सरकारी बचत की जगह अब सरकारी खपत में सरकारी खुपडि़या दौड़ा दौड़ा कर बेहाल हो गये मगर ससुरा बजट था कि जित्‍ता खर्च करो बढ़ता ही जाता था ।

ऑफिस के बाबूओं के चकरघिन्‍नी हो जाने के बाद भी जब बजट का निकाल ( यह सरकारी शब्‍द है) जब पल्‍ले नहीं पड़ा तो साहब से मार्गदर्शन चाहा गया, साहब ने मोबाइल से मार्गदर्शन दिया, कि पहले लिस्‍ट बना लो कि अपने ऑफिस में क्‍या क्‍या होता है, और उसमें क्‍या क्‍या सामान लगता है या क्‍या क्‍या खर्च होता है फिर उसके सामने खर्चा डालना शुरू करो ।

बाबूओं ने साहब के निर्देशानुसार लिस्‍ट बनाना शुरू की, लिस्‍ट बनी तो ठाकुर साहब द्वारा हवन के लिये लिखाई जाने वाली सूची की तरह बन गयी । अब इस लिस्‍ट में खर्चा डालने का काम शुरू हुआ, सारे खर्चे डालने के बाद भी बजट फिर भी एनकाउण्‍टर नहीं हुआ, फिर सरैण्‍डर हुआ जा रहा था, बाबूओं ने फिर ऊपर से मार्ग दर्शन चाहा, ऊपर से मोबाइल पर आकाशवाणी स्‍टायल में साहब फिर भगवान कृष्‍ण की तरह मुस्‍कराते हुये उवाचे कि ऐसा करो कि मनमानी रकम भर दो, बाबू अर्जुन के मानिन्‍द घिघियाये कि साहब पहले से हम 400 के 3400 और 700 के 70000 लिख लिख कर रखे हैं पर फिर भी साला सरैण्‍डर कर रहा है अब कैसे एनकाउण्‍टर करें ।

साहब ने गीता के सोलहवें अध्‍याय के कृष्‍ण के मानिन्‍द कहा कि आसुरी सम्‍पदा से काम नहीं चल पा रहा तो दैवीय सम्‍पदा भी शामिल कर लो, फिर भी बात न बने तो सत्रहवें अध्‍याय वाले त्रय गुण विभाग कर लो, बाबूओं ने फिर अफसर से मार्गदर्शन चाहा और कहा प्रभो आपकी बातें कुछ समझ नहीं आ पा रहीं, अगर हिन्‍दी में बतायें तो शायद समझ में आ जाये । या फिर मुरैना के अंग्रेजी स्‍कूलों वाली इंग्लिश स्‍टायल में बता दें तो कुछ पल्‍ले पड़ जाये ।

अफसर मोबाइल वाली आकाशवाणी पर फिर कृष्‍ण स्‍टाइल को छोड़ मुरैना के अंग्रेजी स्‍कूलों के टीचर स्‍टाइल में अपनी व्‍याख्‍या सुनाने लगे और बोले, ऐसो करियो जित जित में कोमा लगे होयं तहॉ तहॉं ऐसी ऐसी मद डार दियो तिनके प्रूफ न होतई, और दो चार दिना बाद डिलीट हे जातें । जैसें दीवाल की लिखाई हर महीना के खच्‍च में एण्‍ट्री कर देओ, दीवाल की लिखाई हप्‍ता आठ दिना में मिटरत रही, हम लिखवावत रहे, ऐसेंई लिखीयो हमने भोंपू बजवाये प्रचार के काजें, रिक्‍शान में लाउडस्‍पीकर धरकें बजवाये, गामन में ऐलान करवाये, नास्‍ता फास्‍ता डीजल फीजल सिग डार डूर के देखो अब तिहाई बैलेन्‍स सीट का कहि रही है, फिरऊ बचें तो पेड़ पौधा लगाइबो दिखाय दीयो, कोऊ स्‍पष्‍टीकरण आवे तो कहि दीयो हमने तो लगाये हते, अब गैया भैंसे चर गयीं तो का करें । और बिनकी जाली को खच्‍च डारों तो लिख दीयो के पानी नहीं परो सो सूख साख गये, अबऊ कछु खच्‍च बच परे तो फैक्‍स में और फोनन में दिखाय दीओ, जे सिग कर करू के फिर हमें फोन लगाय लीयो, दूसरे नम्‍बर पे लगईयो, जा नम्‍बर को हम बन्‍द राखेंगे, पबलिक डिस्‍टरब करति है । काऊ को पानी ना आय रहो, काऊ की बिजली नाने तो काऊ की गली में सफाई ना हे रही, अब हम झाड़ू लेके जायें का, सिगुई देस परेसान है, कौन कौन की सुनें सो वा नम्‍बर की सिम खेंच देत हैं ।

बाबूओं ने साहब की समझाइस के अनुसार फिर से बजटिंग का एनकाउण्‍टर करना शुरू किया, फिर भी बजट था कि सरैण्‍डर कर रहा था । हैरान परेसान बाबूओं ने आखिर खेंच के दारू का मद भी चढ़ा दिया, साहब की डेली इत्‍ती, बाबूओं ने इत्‍ती और आने जाने वाले अतिथियों ने इत्‍ती और रोज टाइमपासीयों ने इत्‍ती पी ......। आखिर जब हिसाब लगाया तो अब न केवल बजट एनकाउण्‍टर हो गया बल्कि शॉट डेड हो गया, बल्‍कन ओवर बजट हो गया ।

मार्च क्‍लोजिंग हो गया, अब जब साहब पर्सनल टूर से लौटेंगे तो पीठ ठोकेंगे वाह भई वाह, हूं साला बार बार सरैण्‍डर कर रहा था, कर दिया एनकाउण्‍टर हो गया शॉट डेड । निबट गया गड़रिया की तरह, जादा ही अति धर रखी थी ।

शनिवार, 1 मार्च 2008

हास्‍य / व्‍यंग्‍य तानसेन का सितारा और ताजमहल का गुम्‍बज काहे न भयो आई.एस.आई

हास्‍य / व्‍यंग्‍य

तानसेन का सितारा और ताजमहल का गुम्‍बज काहे न भयो आई.एस.आई

नरेन्‍द्र सिंह तोमर ''आनन्‍द''

आजकल टी.वी. पे मियां तानसेन छाये हुये हैं, जागो ग्राहक जागो कम्‍पनी वाले देश को चेता रहे हैं कि मियां तानसेन का सितारा आई.एस.आई. मार्क वाला न हुआ तो तानसेन घटिया हो गया, उसका संगीत और तान बेसुरी हो गयी वह दो कौड़ी का गवैया तो छोड़ो आदमी भी नहीं रहा ।

लोग कहते हैं तानसेन की तान सुन कर ''धरा मेरू सब डोलते सुन तानसेन की तान'' और दीपक राग जब वे गाते थे तो दीपक अपने आप जल उठते थे ।

जागो ग्राहक जागो ने आज देश की ऑंखे खोल दीं हैं, देश जो युगों से बेवकूफ बनता आ रहा था और तानसेन को महान तीस मारखां गवैया माने बैठा था, जागो ग्राहक जागो वालों ने दूरदर्शन के जरिये देश को सच्‍चा ज्ञान देकर ''तमसो मा ज्‍योतिर्गमय'' यानि अंधेरे से प्रकाश की ओर कर दिया है ।

चलो अच्‍छा हुआ ''जागो ग्राहक जागो'' नामक कम्‍पनी ने तानसेन के सितारे की ब्राण्डिंग चेक कर ली और देश को बता दिया कि ससुरा तानसेन का सितारा तो आई.एस.आई. था ही नहीं, साथ ही जहॉंपनाह को भी आगाह कर दिया और उन्‍हें तानसेन के बेआईएसआई सितारे के खतरे से चेता दिया अब जहॉंपनाह तानसेन का सितारा नहीं सुनते । वरना तानसेन के सितारे से या तो उनके कान फट जाते या करण्‍ट लग जाता या ब्‍लास्‍ट ही हो जाता सो सारी सभा ही उड़ जाती ।

उफ कितना उपकार किया है ''जागो ग्राहक जागो'' नामक कम्‍पनी ने देश के ऊपर ।

अब भईया मैं पी.एम. होता जो गारण्‍टी से ऐसी अमूल्‍य व महत्‍वपूर्ण रिसर्च के लिये कम्‍पनी को या तो भारत रत्‍न दे देता या नोबल पुरूस्‍कार ही रिकमण्‍ड करवा देता । पर अफसोस मेरा नंबर हर बार काट कर कोई न कोई दूसरा ही कुर्सी पर बैठ जाता है ।

ससुरी बेवकूफ है मध्‍यप्रदेश सरकार जो हर साल तानसेन समारोह मना मना कर करोड़ों फूंक देती है, इत्‍ता पैसा अगर तानसेन को दे देती तो बेचारा कम से कम एक अदद आई.एस.आई. मार्के का सितारा तो ले आता ।

ग्‍वालियर वाले सफां सिरफिरे हैं जो तानसेन की जन्‍मस्‍थली बेहट और उनके मकबरे पे शीश नवा नवा के टेढ़े हुये जा रहे हैं । मैं बहुत दिनों से ग्‍वालियर वासीयों की लगातार झुकती जा रही कमर देखकर बेहद परेशान था और उन्‍हें सीधा करने का उपाय भी समझ नहीं आ रहा था । उनकी आधी कमर मंहगाई के बोझ से और चौथाई महानुभावों, अफसरों और नेताओं के आगे झुक झुक कर टेढ़ी हो जाती है, बची खुची ऐतिहासिक व धार्मिक हस्‍तीयों के शीश नमन में  टेढ़ी हो लेती है, सो ग्‍वालियर वाले अक्‍सर किसी से मिलते वक्‍त सीधे दण्‍डवत कर मिलते हैं , यानि हण्‍ड्रेड परसेण्‍ट कमर झुकाकर ।

चलो कम्‍पनी ने बता दिया, आगाह कर दिया । अब ग्‍वालियर वालों को बेहट में जाकर और तानसेन के मकबरे पर मथ्‍था टैकी नहीं करनी पड़ेगी, सो कमर का कुछ परसेण्‍ट तो टेढ़ा होना रूक ही जायेगा

अब ताजमहल और बचा है, उसकी भी ट्रेड मार्किंग और ब्राण्डिंग हो जाये तो चैन आ जाये । ससुरा उस पर भी आई.एस.आई. नहीं है । ऐसे ताजमहल से देश को और पर्यटकों को भारी खतरा है जिस पर आई.एस.आई. का मार्का नहीं है ।

उधर मियां तानसेन ने जब टी.वी. देखा और कॅम्‍पनी के विज्ञापन में अपने सितारे की कलई खुलती देखी तो बेचारे आजकल वकीलों के चक्‍कर लगाते फिर रहे हैं कि कोई उनके सितारे का ट्रेडमार्क करवा कर आई.एस.आई. चिहन दिलवा दे । अब वकीलों की फीस ज्‍यादा है और आई.एस.आई. के बाबू अफसरों की रिश्‍वत डिमाण्‍ड हाई है सो बेचारे मियां तानसेन इस दर से उस दर ठुकियाते फिर रहे हैं ।

मियां मुझसे मिले और बोले ठाकुर साहब हमारी दरखास (एप्‍लीकेशन) इण्‍टरनेट से ऑनलाइन ऊपर पहुँचा दो कि हमें बड़ी दिक्‍कत आ रही है, हम लेना चाहते हैं मगर, आई.एस.आई. नहीं मिल पा रिया है, साले ऊपर बैठे लोग फन्‍देबाजी कर रिये हैं । पैसा पैसा चिल्‍ला रिये हैं, फत्‍तरों (पत्‍थरों) के सैर (शहर) में आ गिया हूं , कोई सुनई नहीं रिया है ।

हम बोले मियां तानसेन जि आनलाइन फोन लाइन का कोई मतलब नहीं है । कोई नहीं सुनता है । कोई कार्रवाई फार्रवाई नहीं होती, सब हाथी के दिखाऊ दांत हैं, हमने शिकायत कर कर के इण्‍टरनेट छक्‍क भर दिया है, पर न कोई के कान पे जूं रेंगी न गाज गिरी । नकली नौटंकी है सब ।

मियां तानसेन घबराये और बोले, तो मैं कहॉं जाऊं, मैंने प्‍यारी सी कीमती सलाह फोकट में तानसेन के कान में चुपके से दी, मियां इलेक्‍शन आ रहे हैं, चुनाव चिहन सितारा बना कर कहीं से फाइट कर लो, जीत गये तो सरकार बन जाओगे और ऐश करोगे और तुम्‍हारा सितारा ब्राण्‍ड एम्‍बेसेडर हो जायेगा और तुम भारत रत्‍न, अगर हार गये तो कम से कम नेता तो बन ही जाओगे और दलाली चालू कर देना, फिर खुद का सितारा तो चल ही जायेगा साथ ही दूसरों के सितारे भी चमकाने लगोगे ।

मियां को मेरी सलाह जंच गई और अब वे इलेक्‍शन फाइट करने के लिये गली गली सितार बजाते डोल रहे हैं, कई सितार खानों के उदघाटन भी कर आये हैं , शादी का भोज हो, भण्‍डारा हो या तेरहवीं वे कोई मौका नहीं गंवा रहे । उनका ख्‍याल है कि अन्‍य बजटों की तरह सितारा बजट भी अलग से सरकार को पेश करना चाहिये । और अपनी बेसुरी वाणी और गैर आई.एस.आई. मार्के सितारे के साथ मोहम्‍मद रफी का गाना ''तुम मुझे यूं भुला न पाओगे, जब कभी भी सुनोगे गीत (राग) मेरे, संग संग तुम भी गुनगुनओगे'' गाते हुये आजकल देश में चक्‍कर लगा रहे हैं ।

 

 

रविवार, 27 जनवरी 2008

परिसीमन का साया और : नेता जी का ट्रेडमार्क नाम दरोगा धर दो – चाहे सौ के सत्‍तर कर दो

परिसीमन का साया और : नेता जी का ट्रेडमार्क

नाम दरोगा धर दो – चाहे सौ के सत्‍तर कर दो

नरेन्‍द्र सिंह तोमर ''आनन्‍द''

करवट – 3 श्रंखलाबद्ध आलेख

 

पिछले अंक से जारी ...

 

अभी वैसे चुनाव में टाइम है, लेकिन राजनीतिक हवाई बमबारी तो पिछले महीने ही चालू हो चुकी है । यद्यपि राजनीतिक युद्ध के पूर्वाभ्‍यास तो चार महीने पहिले ही चालू हो गये थे । अब ये वक्‍त बतायेगा कि किसके फाइटर्स ज्‍यादा कामयाब रहेंगे ।

वैसे लोकल नेताओं को दिल्‍ली और भोपाल से कहीं ज्‍यादा टेंशन हो गया है । परिसीमन की छाया या साया जहॉं कहीं लोकल राजनीतिक दूकानें बन्‍द करा देगा वहीं नई एजेन्सीयां भी चालू करा देगा ।

गिड़गिड़ा और भिड़भिड़ा रहे हैं लोकल ठेकेदार आफ नेतागिरी

अब किसी कलेक्‍टर कमिश्‍नर या एस.पी. को ऐसे दिन देखने पड़ें कि वह रिरिया रिरिया कर घिघिया कर बाबू या थानेदार बनाने के लिये लोगों के चरण चुम्‍बन करता फिरे तो इसे आप क्‍या कहेंगे, वक्‍त की मार या मुकददर का पलटवार या फिर बुरे दिनों की दस्‍तक से घबराकर चने चबाने की जुगत ।

खैर जो भी हो ऐसा टाइम आ गया है और बड़े बड़े नेताजी की टांय टांय फिस्‍स हो रही है । बड़े नेताजी अब छोटे नेता बनने के लिये रिरियाने और गिड़गिड़ाने में लगे हैं ।

सबसे ज्‍यादा हालत खराब मुरैना सांसद अशोक अर्गल की हो रही है । वे अब अब सांसद से विधायक बनने के लिये दण्‍ड बैठक लगाते फिर रहे हैं । दरअसल युगों से चली रही आ रही मुरैना लोकसभा सीट अब आरक्षित से सामान्‍य सीट में तब्‍दील हो गयी है और मुरैना संसदीय सीट की महज अब एकमात्र विधानसभा सीट अम्‍बाह ही आरक्षित बची है । अब अर्गल भईया का अनर्गल प्रलाप कुछ इस कदर परवान चढ़ रहा है कि वे भाजपा के छोटे से छोटे और बड़े से बड़े नेताओं के आगे घिघियाते फिर रहे हैं, मजे की बात ये है कि भले ही अर्गल अपनी चमचागिरी किसी और वजह से कर रहे हों लेकिन मुरैना जिले के गली कूचों में पत्‍ते पत्‍ते पर यह दास्‍तां अब आम है । कुछ जोरदार फोटोग्राफ ऐसी विकट चमचागिरी के हमें उपलब्‍ध हुये हैं । खैर यह अर्गल के राजनीतिक और व्‍यक्तिगत अस्तित्‍व व भविष्‍य का प्रश्‍न है सो उनका चमचे आम हो जाना स्‍वाभाविक ही है । मगर इतना साफ है कि अगर अशोक अर्गल जैसा कि सुनने में आया है कि अम्‍बाह विधानसभा के अलावा भिण्‍ड संसदीय क्षेत्र से भी टिकिट पाने की जुगाड़ में लगे हैं । ज्ञातव्‍य है कि भिण्‍ड दतिया संसदीय क्षेत्र (मैं यहॉं चुनाव लड़ चुका हूँ) अब सामान्‍य से आरक्षित हो गया है, और अशोक भाई इस मौके को गंवाना नहीं चाहते । सो सेटंग भी हाई लेवल की बिठाने में लगे हैं । अब ये उनका वक्‍त और मुकददर तय करेगा कि ''तेरा क्‍या होगा ....''

मगर इतना तो साफ है कि वर्षों से सत्‍ता सुख और राजनीतिक भोग विलास में आकण्‍ठ डूबे रहे अशोक अर्गल को अपनी राजनीतिक सत्‍ता का इस कदर छिनना रास नहीं आ रहा । आना भी नहीं चाहिये, आखिर तुलसी भईया उवाचे हैं कि दौलत की दो लात हैं, तुलसी निश्‍चय कीन । आवत में अन्‍धा करे, जावत करे अधीन ।। मुँह लगी मलाई अब इतनी आसानी से तो पिण्‍ड नहीं छोड़ेगी ।

पद, दौलत और प्रभाव जाते ही अच्‍छे अच्‍छे पगला जाते है, सो जाते नेताओं के घर मातम होने लगा है तो कौनसी विचित्र बात है । वेसे भी लोकतंत्र इसी का नाम है कि बेटा आज तेरा तो कल मेरा ।

जब मध्‍यप्रदेश में कांग्रेस की सरकार थी तो भाजपाईयों की हर चौराहे पर ठुकाई हो जाती थी और एक अदना सा सिपाही चाहे जब डण्‍डा डालकर भीतर कर देता था । अब टाइम पल्‍टा खा गया है जो हाल तब उनके थे वो अब आजकल उनके हैं ।

खैर ये लोकतंत्र है, बदलती राजनीति है, ऐसा तो अब रिवाज ही बन गया है, आम जनता की रिपोर्ट भले ही पुलिस कभी नहीं लिखती हो या आर्थिक अपराध अन्‍वेषण ब्‍यूरो हजारों आम शिकायतों को कचरे में फेंक देता हो लेकिन हाई मैटर्स जो कवरेजेबल हों और समूचे मीडिया पर हेडलाइन बन कर छा जायें और जिनसे संसद या विधानसभायें ठप्‍प हो जायेंए उनकी कायमीयां तो चुटकी में ठोक देते हैं । चाहे राष्‍ट्रध्‍वज अपमान हो चाहे डम्‍पर हो चाहे देवास जमीन हो चाहे सहकारिता वाले मंत्री का मैटर हो चाहे सुभाष यादव या अन्‍य .... ।

भले ही मामले बाद में अर्जी फर्जी निकलें मगर चर्चा कराना, ठप्‍प कराना और आक्‍थू आक्‍थू के खेल में रैफरी के बजाये लाउडस्‍पीकरिया या एम्‍पलीफाइंग भूमिका मात्र निभा देना अब प्रशासनिक मशीनरी की डयूटी मात्र बन कर रह गयी है । कभी इसके हाथ खिलौना कभी उसके हाथ । उनके सकार में आ जाने का डर भी है तो उनकी सरकार चल रही है ये खौफ भी है । मगर प्‍यारे सच्‍ची बात ये है कि ये खेल अब लगभग बेअसर से हो गयें हैं, जनता को तो कोई मामला समझ ही नहीं आ रहा । जनता तो केवल इस कबडडी की मूक दर्शक मात्र है ।

अब ये दीगर बात है कि अम्‍बाह वाले नेताजी अर्गल को अपने एरिया में घुसने देंगें कि नहीं या भिण्‍ड में नेता लोग इम्‍पोर्टेड नेता चाहेंगे कि नहीं, मगर अशोक भाई को खुशफहमी है कि राज करना और हुकूमते चकाचौंध वे अपने ललाट में लिखा लाये हैं, उनकी कुण्‍डली के ग्रह बकाया नेताओं से ज्‍यादा बलवान बैठते हैं ।

अब बंशीलाल और मुंशीलाल क्‍या करेंगें, ये अर्गल भाई जरा सोच लीजिये । वैसे भी मुंशीलाल को पिछली विधानसभा में टिकिट नहीं मिला था, जिस पर काफी दंगा और पंगा भी हो चुका है । अगर आपको यह भ्रम है कि अम्‍बाह सीट पर भाजपा जीतती है, व्‍यकित नहीं, तो यह दूर हो जाना चाहिये । नजदीकी सीट दिमनी विधानसभा अब सामान्‍य हो जाने का असर चौतरफा होने वाला है । अम्‍बाह विधान सभा क्षेत्र आरक्षित भले ही हो, लेकिन यह रहस्‍य किसी से छिपा नहीं कि इस सीट का अम्‍बाह पोरसा क्षेत्र विशुद्ध राजपूत बाहुल्‍य है । और दिमनी विधानसभा क्षेत्र नये परिसीमन के मुतल्लिक राजपूत बाहुल्‍य है । अत: उनके समर्थन के बगैर यहॉं पार पाना असंभव नहीं तो मुश्किल ही है ।

वर्तमान विधायकों और नेताओं से जनता वैसे ही खफा चल रही है । ऐसे में जहॉं दिमनी विधानसभा में भी अब नेतागिरी की कई दूकानें बन्‍द होंगीं वहीं नये राजनीतिक गढ़ भी उभरेंगें । अभी तक यह सीट भाजपा के प्रभाव की मानी जाती रही है । वहीं निकटस्‍थ अम्‍बाह विधानसभा क्षेत्र भी दिमनी विधानसभा के समानान्‍तर में ही प्रभावित रहती है । दिमनी क्षेत्र से जहॉं मुंशीलाल, और संध्‍या राय का सत्‍ता समापन होगा वहीं । अधिक संभव है कि इस सीट पर अब समीकरण पूरी तरह नये तरीके से बनेंगें । शुरूआत में इस सीट पर भावी मुख्‍यमंत्री के नाम और यहॉं चुनाव लड़ने वाले के जातिगत व व्‍यक्तिगत प्रभाव का असर ज्‍यादा रहेगा । यहॉं वहीं राजनीतिक दल लाभ उठा सकेगा जो, सोच समझ कर प्रत्‍याशी खड़ा करेगा ।

हालांकि दिमनी विधानसभा के लिये आजकल जो खुसुर पुसुर जारी है और जो इस क्षेत्र पर नेतृत्‍व की दावेदारी ठोकने में लगे हैं, मुझे नहीं लगता कि वे इस सीट पर सीट निकाल सकेंगें ।

कहीं न कहीं नेताओं में खोट जनता देख रही है, और लोगों में एक आम आक्रोश भी है । दिमनी विधानसभा और अम्‍बाह विधानसभा क्षेत्र न केवल स्‍वयं अपने आप में महत्‍वपूर्ण हैं बल्कि समूचे संसदीय क्षेत्र की राजनीति को प्रभावित करने की ताकत रखने वाले क्षेत्र हैं । यह तोमर राजाओं के वारिसों का क्षेत्र है और यहॉं के लोगों में स्‍वाभिमान और बात पर अटल रहने की तासीर आज तक है । चालू भाषा में इसे ऐंठ में रहना कहा जाता है । या कभी कभी सनकी होना उवाचा जाता है ।

दिमनी विधानसभा सीट पर काफी लम्‍बे अर्से से आरक्षण रहने से, इस क्षेत्र की राजनीति लगभग समाप्‍त प्राय सी हो चुकी है । और इस क्षेत्र के मूल रहवासी राजनीति से बरसों दूर रहने के बाद अपना राजनीतिक अस्तित्‍व लगभग भूल कर अभी पशोपेश में ही हैं कि आखिर कौन होगा जो उनकी तकदीर बदलेगा ।

 

क्रमश: जारी अगले अंक में .........

 

गुरुवार, 17 जनवरी 2008

भारत रत्‍न दो रूपया किलो, पद्मश्री पॉंच की पसेरी

व्‍यंग्‍य

भारत रत्‍न दो रूपया किलो, पद्मश्री पॉंच की पसेरी

चाहिये भारत रत्‍न तो आ जाओ चम्‍बल में

नरेन्‍द्र सिंह तोमर ''आनन्‍द ''

मुरैना 18 जनवरी । जी हॉं चौंकिये नहीं , हम पुरूस्‍कारों की बाज नहीं कर रहे हैं, यह नई वेरायटी की सब्‍जीयों के दाम हैं । शहर में इन दिनों काछीयों ने सब्‍जी बेचने का नया तरीका ईजाद किया है, जब मैंने पहली बार एक सब्‍जी वाले ठेले पर ऐसी आवाज सुनी तो मैं भी चौंक गया था । फिर बाहर आकर हकीकत जानी तो महज मुस्‍करा कर ही रह गया । हालांकि मेरा भी मन हुआ था कि पसेरी भर भारत रत्‍न मैं भी तुलवा लूं ।

हुआ कुछ यूं कि कुछ काछीयों की कम्‍पटीशन और ग्‍लोबलाइजेशन के चलते सब्‍जीयों की बिक्री में मन्‍दी आ गयी तो वे चिन्तित हो गये । काछीयों की पंचायत बैठी, चिन्‍तन हुआ फिर मन्‍थन हुआ । आखिर शिविर समाप्‍त हुआ, तय हुआ कि मार्केटिंग के नये गुर अपनाने होंगें और इसके लिये जिम्‍मेवारी निर्वहन एक बूढ़े काछी को सौंपी गयी । बूढ़े काछी ने टी.वी., इण्‍टरनेट और एमबीए फेमबीए सब पुस्‍तक किताब अखबार खंगाल डाले और पाया कि आज का हॉट क्‍या है यानि टॉप ई मेल स्‍टोरी क्‍या है । बूढ़े काछी को इतनी लम्‍बी खोज के बाद मिले ''भारत रत्‍न और पद्मश्री'' यही आजकल हॉट हैं, यही मोस्‍ट ई मेल्‍ड स्‍टोरी हैं ।

बूढ़े काछी ने गला खंखारा और महागुरू स्‍टायल में बोला कि ''लाल बुझक्‍कड़ बूझ के और न बूझो कोय, हरी हरी सब्जियन में रत्‍नश्री धर देय ।।खूब बिके फूलें फलें चमके किस्‍मत सोय । फ्रेश सेण्‍टरवा मारे बास, जो रत्‍नश्री धर लेय ।।

काछीयों को बूढ़े काछी की बात जंच गयी और अब सारे काछीयों ने अपने अपने साग भाजी ''भारत रत्‍न और पद्मश्री'' के नाम से बेचना शुरू कर दिये । अब काछीयों का माल भी खूब बिक रहा है और खरीदने वालों को भी मंहगे दाम चुकाकर भी तसल्‍ली होती है, आखिर वे भारत रत्‍न दो रूपया किलो और पद्मश्री पॉंच रूपैया पसेरी में खरीद कर खा रहे हैं ।

मैंने ये काछीयों वाला मामला जब अपने गांव में गांव वालों को सुनाया, तो पहले तो वो ठठा कर हँसे लेकिन बाद में गुरू गम्‍भीर हो गये आखिर ठाकुरों में अक्‍ल जरा देर से जो आती है । और अम्‍बाह की गुरूवारी हाट और मुरैने (हमारे यहॉं मुरैना को मुरैने और अम्‍बाह को अमाह कहा जाता है) की मंगलवारी हाट में जब कोई जानवर बेचने लाते हैं, तो उसकी मार्केटिंग के लिये कह देते हैं कि इसने सौ क्विंटल भारत रत्‍न और डेढ़ सौ क्विंटल पद्मश्री खाये चबाये और पचाये हैं ।

 

यह महज एक व्‍यंग्‍य आलेख है, उसी रूप में कृपया इसे ग्रहण करें

 

बुधवार, 16 जनवरी 2008

परिसीमन का साया और नेताओं की बैचैनी, इक पहलवान अम्‍बाले का इक पहलवान पटियाले का

परिसीमन का साया और नेताओं की बैचैनी, इक पहलवान अम्‍बाले का इक पहलवान पटियाले का

नरेन्‍द्र सिंह तोमर ''आनन्‍द''

करवट – 2 श्रंखलाबद्ध आलेख

 

पिछले अंक से जारी ...

चन्‍दन चाचा के बाड़े में ... यह एक मशहूर कविता है जो पहले हमारे कोर्स में चलती थी जब हम स्‍कूल में थे, इसमें नागपंचमी के अवसर पर होने वाली कुश्‍ती दंगल के बारे में रोचक एवं मनोहारी चित्रण है ।

परिसीमन से गर्मायी राजनीति के चलते अंचल इस समय राजनीति का चन्‍दन चाचा का अखाड़ा बन गया है । यूं तो चम्‍बल घाटी में कई चन्‍दन चाचा हैं, मेरे गांव में भी एक चन्‍दन चाचा हैं, अब वे काफी वृद्ध हो चुके हैं लेकिन मैं उनका सबसे प्‍यारा बेटा यानि पहलवान रहा हूँ । लेकिन राजनीति एक ऐसी कुश्‍ती है कि जिसके पहलवान हम जैसे नहीं कुछ और ही किस्‍म के लोग हुआ करते हैं । राजनीति के पहलवान दूध घी और बादाम से नहीं बल्कि सुरा सुन्‍दरी और धुँआ पानी तथा बड़ी तगड़ी कार गाड़ीयों से नापे जाते हैं । अब भुजबल की नहीं बाहुबल की ताकत से अंदाज लगाया जाता है कि अमुक राजनीतिक दल का अमुक पहलवान कैसा खेलेगा । अब भलमनसाहत से नहीं गुण्‍डापन से लोकप्रियता का आकलन किया जाता है । वगैरह वगैरह यह भी पार्टीयों के लिये जानना जरूरी है कि जीतने के बाद कित्‍ते कमा सकेगा कित्‍ते खिला सकेगा । यूं कि कुल मिला कर राजनीति का चयन क्राइटिरिया कुछ अलग किस्‍म का होता है । चमचागिरी के अव्‍वल उस्‍ताद और वर्षों तक किसी बड़े नेता के यहॉं ढोक लगाते रहे हों तथा टिकिट मांगने जाते वक्‍त आपके साथ कितने वाहन और कितनी भीड़ है, इससे दिल्‍ली और भोपाल में बैठे बड़े नेताजी अंदाज लगाते हैं कि आप चुनाव जीत सकते हैं कि नहीं ।

मेरे एरिया के नेता सुपरहिट शोले फिल्‍म की तरह कुछ इस किस्‍म का मसाला अभी से इकठठा करना शुरू कर दिये हैं ।

इस देश में जहॉं छुटभैये नेताओं की कमी नहीं तो छुटभैयों के चमचों की भी कोई कमी नहीं है ।

एक कहावत है कि बरसात गिरते ही हर छोटा बड़ा गढढा पानी की चन्‍द बूंदों का आयतन पाते ही खुद को ताल तलैयां और सागरों से तौलने लगता है , बिल्‍कुल इसी तरह नेता जी (नये नेता जी) जैसे नया मुल्‍ला प्‍याज ज्‍यादा खाता है या ज्‍यादा अल्‍लाह चिल्‍लाता है नये नेता जी मतलब वे नेता जी जो किसी छुटभैये के चमचे बनकर उसके दरबार में सुबह शाम की हाजरी बजाने को ही राजनीतिज्ञ होना समझते हैं और उनके साथ जाकर बनियों हलवाईयों तथा चपरासीयों को धमकियाना शुरू कर देते हैं वे अपने आप को मनमोहन सिंह या अटलबिहारी से कम नहीं मानते । और खादी भण्‍डार की दूकान पर जाकर नई ड्रेस और जैकेट खरीद कर बगुला बन कर स्‍वयं को भावी मुख्‍यमंत्री या प्रधानमंत्री के रूप में देखने लगते हैं ।

छुटभैयों के चमचों को छुटचमचे कहे तो बेहतर हैं, परिसीमन की चर्चा के चलते कुछ छुटचमचे इन दिनों अंचल में अतिसक्रिय हो गये हैं और अपने आका के लिये फोनों पर धमकियाने के अलावा फण्‍ड अरेन्‍जमेण्‍ट और माहौल बनाने तथा मीडिया में नाम चलवाने की जुगत में जी तोड़ मेहनत में जुट गये हैं । वहीं कुछ हसीनायें भी सक्रिय होकर नेताओं के साथ तफरीह में लग गयीं हैं । यूं तो नेता महिलाओं के बगैर कहीं पग नहीं धरते और जैसे सीमा पर लड़ती सेना के सैनिक दो बूंद जिन्‍दगी की यानि प्‍यार की तलाश में आत्‍महत्‍यायें कर तनाव के विषाद में डूबे रहते हैं, ठीक उसी तरह बिन महिला नेत्री छुटचमचों को पार्टी या राजनीति में न रस आवे है न रूतबा लागे है ।

यूं तो लगभग हर राजनीतिक दल अपनी महिला विंग बनाता है, और महिला नेत्रीयां उनके साथ अक्‍सर सफर में या बैठकों में रहतीं है मगर .....खैर छोड़ो ।

हॉं तो परिसीमन की दस्‍तक के साथ ही बड़े नेताओं के छुटभैये सक्रिय होकर राग चुनावी अलापना शुरू कर दिये हैं और छुटचमचों ने उनके ख्‍वाबों को ताबीर देने का काम चालू कर दिया है ।

जहॉं गाडि़यों की बड़ी संख्‍या, फण्‍ड अरेन्‍जमेण्‍ट और सुरा सुन्‍दरी तथा भीड़ गुण्‍ताड़ा की मशक्‍कत चालू हो गयी है वहीं एरिया के टेम्‍परेचर लेने का काम भी चालू है ।

अब टिकिट मांगने वालों की कतार अभी से बनना शुरू हो गयी है और चुनाव यानि की शादी ब्‍याह के लिये लोग ऐन वक्‍त पर रिस्‍क लेने के मूड में नहीं हैं ।

मजे की बात ये है कि शहरों में कुछ लोग भीड़ व वाहन सप्‍लाई का व्‍यवसाय भी शुरू कर चुके हैं, और प्रतिवाहन व प्रति व्‍यक्ति सप्‍लाई नारों सहित या बगैर नारों सहित उनकी दरें अलग अलग हैं ।

 

     क्रमश: जारी अगले अंक में .........