Friday, July 10, 2009

किस्‍सा ए मुरैना: पत्रकार बनना है तो लाओ दो हजार, सरकार उवाच ......

किस्‍सा ए मुरैना: पत्रकार बनना है तो लाओ दो हजार, सरकार उवाच ......

मुरैना डायरी (वर्ष 1999 से प्रकाशित)

नरेन्‍द्र सिंह तोमर ''आनन्‍द''

(लेखक अनेक पुरूस्‍कारों व सम्‍मानों से सम्‍मानित प्रख्‍यात समाजसेवी, साहित्‍यकार, पत्रकार एवं क्रिमिनल लॉयर व इन्‍वेस्‍टीगेटर है )

आज फिर एक बार मुरैना डायरी का अंक आपके सामने है, एक लम्‍बा अर्सा हुआ यह स्‍तम्‍भ प्रकाशित नहीं हो पा रहा था । पर थोड़ी रूकावट के बाद सही फिर आपके सामने आया ।

मोगाम्‍बो खुश हुआ

हमारे मुरैना में एक मोगाम्‍बो हैं, काफी फेमस हैं और एक अर्सा पहले अखबारों की हाकरी किया करते थे आजकल बड़े साहब के मुँह लगे है, मुँह क्‍या लगे हैं यूं कहिये कि छाती पान लगा है । अब लोग उन्‍हें साहब का दलाल कहते हैं तो भई ये तो गलत बात है , सरासर गलत । अकेले बेचारे मोगाम्‍बो को ही काहे बदनाम करते फिरते हो , साहब के छाती पान तो शहर में, जिले में गली गली में आवारा कुत्‍तों के मानिन्‍द ब्‍याये पड़े हैं ।

मोगाम्‍बो जो भी हो बड़ा दयालु है, काम करवा ही देता है , पक्‍के में करवा देता है अब थोड़ा बहुत तो हर जगह ही खर्च होता है, कुछ साहब पर कुछ साहब के बीवी बच्‍चों पर , कुछ खुद पर कुछ खुद के बीवी बच्‍चों पर अब सब एडजस्‍ट तो करना ही पड़ेगा न । मोगाम्‍बो चाहे जिसे पत्रकार बना देता है चाहे जिसे पत्रकार से बेलदार बना देता है । एक किस्‍सा गौर फरमाईये ।  

एक बेलदार एक मकान पर बेलदारी कर रहा था, मोगाम्‍बो भाई वहॉं घूमते घामते पहुँच गये, मोगाम्‍बो भाई ने पहली नजर में ही भॉंप लिया कि शिकार मुकम्‍मल और वजनदार है । मोगाम्‍बो भाई बेलदार से बोले काहे कित्‍ता कमा लेते हो रोजाना, बेलदार बोला कि साब हमारी रेट सबको मालुम है लेकिन काम मिलता रहे इसकी कोई गारण्‍टी नहीं, जब काम नहीं मिलता तब दिक्‍कत हो जाती है ।

मोगाम्‍बो भाई बोले कि चल बीड़ी पिला , बेलदार ने बीड़ी सुलगाई कश के साथ बाते आगे बढ़ाते मोगाम्‍बो बोला कि बोल कुछ इन्‍तजाम करवाऊं क्‍या, बेलदार ने गदगद स्‍वर में कहा कि का साब का करवाओगे ।

मोगाम्‍बो भाई बोला कि ऐसा कर कब तक ये मजदूरी फजदूरी करता फिरेगा, नरेगा की रोजगार गारण्‍टी में फंस गया तो निबट जायेगा, कम रेट और कमीशन कटा के मजदूरी के नाम पर ढेढ़स पावेगा, और मजदूरी नहीं करेगा तो गरीबी रेखा से भी नाम कटा बैठेगा, तू ऐसा कर कि पत्रकार बन जा ।

मोगाम्‍बो की बात सुन कर बेलदार चौंका और बोला कि साहब जे का होता है । मोगाम्‍बो ने उसे ईगर फुल देखा तो बोला कि अबे तेरे को नहीं पता कि जे का होता है, साला पत्रकार तो बहुत बड़ी तोप होता है , हरेक में डण्‍डा डाल देता है ।

बेलदार उत्‍सुक होता हुआ बोला कि बनवाय देओ साब, कैसें बनेंगे, का तरीका है ।

मोगाम्‍बो बोला कि अरे कुछ नहीं दो हजार जमा कर सो लोकल नीला पर्चा, हरा पर्चा , हवाबाण टाइम्‍स किसी से भी लिखवा लेंगें कि तू उनका पत्रकार है , फिर दो हजार और लगेंगे सो अधिमान्‍यता के कागज बनवा दूंगा, तीन हजार उसके बाद दे दीओ तो अधिमान्‍यता दिलवा दूंगा बस फिर तो तेरे जलवे ही जलवे हैं ।

बेलदार जो अब तक टांग पसार कर जमीन पर बैठा था , फुर्ती से उकड़ू होता हुआ बोला पत्रकार बन के अधिमान्‍यता मिले पर का फायदा होगा ।

मोगाम्‍बो ने जलती आग में थोड़ा घी और उड़ेला बोला कि बेटा साल में 20 हजार तो आर्थिक सहायता, बस और रेल का कंसेशन पास, घर वालों की दवा दारू और इलाज सब मुफ्त, इसके संग हर वी.आई.पी. के कार्यक्रम में अगाड़ी वाली कुर्सी पक्‍की, नहीं तो वैसे साला भीड़ में धक्‍के खाता फिरेगा और मंत्री, नेता, अफसर के दरसन भी नहीं पावेगा । पुलिस भी सैल्‍यूट मारे तो बात करना ।

बेलदार की ऑखें चौड़ी हो गयीं और हैरत से बोला ऐं इत्‍ते फायदा बाप रे बाप मैं अभी तक कहॉं गढ्ढे में पड़ा पशुयुग में जी रहा था , प्रभु प्रभु कहॉं थे आप अभी तक , धन्‍य हैं आप प्रभु धन्‍य हैं आप । मोगाम्‍बो बोला तो फिर निकाल फटाफट दो हजार और खुलवा देता हूँ तेरा पत्रकारिता का अकाउंट ।

बेचारे बेलदार ने अपने पड़ौसियों से कर्जा लिया और मोगाम्‍बो को दो हजार थमा कर पत्रकार बनने के सपने में बेलदारी छोड़ कर आजकल घर आराम फरमा रहा है ।

बेलदार को पत्रकार और पत्रकार को बेलदार बना देने के हुनर में माहिर मोगाम्‍बो का कारनामा हमारे सामने तब आया जब म.प्र. के पूर्व मुख्‍यमंत्री बाबूलाल गौर के मुरैना आगमन को मीडिया ने प्रकाशित करने से बहिष्‍कार कर दिया और मीडिया के कुछ मोगाम्‍बो के पालतूओं को छोड़ किसी ने कार्यक्रम को तवज्‍जुह नहीं दी, भाई हम भी बहिष्‍कार कर आये थे (बढि़या श्‍लोक और पुराण सुना आये थे, अफसर कुर्सी टेबलों के पीछे दुबकते फिर रहे थे)   इसलिये ग्‍वालियर टाइम्‍स ने बाबूलाल गौर का समाचार प्रकाशित नहीं किया था, हमें काफी ई मेल पाठकों ने इस सम्‍बन्‍ध में भेजे थे आशा है उन्‍हें जवाब मिल गया होगा । बाबूलाल गौर हमारे अतिशय प्रिय और हमारी नजर में अर्जुन सिंह के पश्‍चात सर्वाधिक सफल मंत्री व मुख्‍यमंत्री रहे हैं , उनका म.प्र. का मुख्‍यमंत्रित्‍व काल स्‍वर्णिम रहा है, हम गौर साहब से भी इस सम्‍बन्‍ध में क्षमा मांगना चाहेंगें कि हमारे प्रिय व आदरणीय होते हुये भी हम भरे दिल से न चाहकर भी मोगाम्‍बो के कारण अपने प्रिय मंत्री का समाचार प्रकाशित करने का बहिष्‍कार करना पड़ा । 

जेंगरे और पिल्‍ले

मुरैना में जेंगरा और पिल्‍ला बड़े लोकप्रिय हैं । दरअसल जेंगरा गाय के छोटे मगर कमजोर बछड़े को कहते हैं और पिल्‍ला कुत्‍ते के बच्‍चे को कहते हैं । लेकिन हमारी डायरी के इस भाग में जिन जेंगरो और पिल्‍लों की बात हम यहॉं कर रहे हैं वे न तो गाय के बछेरे हैं, और न कुत्‍ते के पिल्‍ले बल्कि जाने माने मुरैना के नामवर इंसानात हैं और कभी बाकायदा आदमी थे मगर कहते हैं न कि वक्‍त ने गालिब कुत्‍ता कर दिया , सो कुछ ऐसी ही कहानी शहर के मशहूर इन पालतू और दलाल जेंगरों और पिल्‍लों की है ।

 

...............क्रमश: अगले अंक में जारी 

Sunday, June 21, 2009

चमचा में गुन बहुत हैं सदा राखिये संग, कांग्रेस रोती फिरे सामन्ती के संग

चमचा में गुन बहुत हैं सदा राखिये संग, कांग्रेस रोती फिरे सामन्ती के संग

राजनीति से लोकनीति, राजनेता से लोकनेता बनाम राजतंत्र से लोकतंत्र- कांग्रेस की पहल बनाम चिथड़ों से इज्जत ढांपने की कवायद

नरेन्द्र सिंह तोमर ''आनन्द''

अभी हाल ही में एक खबर पढ़ने में आयी कि कांग्रेस ने राजे रजवाड़े या सामन्ती प्रतीक नाम उल्लेखों के उपयोग पर रोक लगा दी है !

खबर ठीक है, और लगता है कि कांग्रेस देश में आधे अधूरे लोकतंत्र को या राजतंत्र के बदनुमा दागों को साफ कर साफ सुथरा परिपक्व लोकतंत्र लाना चाह रही है ! साधारण बुध्दि के हर व्यक्ति को यही आभास होगा ! मैंने इस पर चिन्तन किया ! मुझे इसलिये भी विचार करना पड़ा कि मेरा खुद का सम्बन्ध भी रजवाड़े से है और यह अलग बात है कि जो असल रजवाड़े या राजपूत हैं वे आमतौर पर किसी भी सामन्ती नामोल्लेख को नहीं करते ! असल राजा और राजवंश अधिकतर न तो आमतौर पर कुंवर, राजा या महाराजा या अन्य ऐसा कुछ लिखते हैं बल्कि सीधे सपाट अपना नाम लिखते हैं ! भारत में राजपूतों व रजवाड़ों में अपने उपनाम को साथ लिखने का सामान्य तौर पर रिवाज है जैसे मैं तोमर हूँ और तोमर राजवंश का प्रतीक उपनाम तोमर जो कि मुझे जन्म से ही मिला हुआ है अब भई इसे मैं कैसे छोड़ सकता हूँ !

अब तोमर राजवंश ने दिल्ली बसाई, महाभारत जैसा महान युध्द लड़ा, इन्द्रप्रस्थ निर्मित किया, महाराजा अनंगपाल सिंह ने दिल्ली में लालकोट बनवाया, लोहे की कील गड़वाई (लौह स्तम्भ) या सूरजकुण्ड हरियाणा में ठुकवा दिया या ऐसाह में गढ़ी बसाई या महाराज देववरम या वीरमदेव ने ग्वालियर पर तोमर राज्य स्थापना की तो इसमें मेरा क्या कसूर है ! अगर पुरखों को पता होता कि सन 2009 में जाकर उनके वंशजों को उनके कुकर्मों का दण्ड भोगना पड़ेगा और अपने होने की पहचान खत्म करना पड़ेगी और तोमर होना या कहलाना एक राजनीतिक दल विशेष के लिये अयोग्यता हो जायेगी या भारतीय जीवनतंत्र में उन्हें बहिष्कृत होना पड़ेगा तो वे काहे को ससुरी दिल्ली बसाते काहे को राज्य संचालन करते काहे को महाभारत लड़ते और काहे को इस भारत की सीमाये समूची एशिया तक फैलाते ! काहे को भगवान श्रीकृष्ण के वसुदैव कुटुम्बकम सिध्दान्त पर अमल कर अमनो चैन का शासन करते !

अब कुछ लग रहा है कि पुरखों ने दिल्ली बसा कर ही गलत कर दिया न दिल्ली होती न देश में टेंशन होता ! दिल्ली की वजह से पूरे देश में टेंशन है ! खैर चलो अच्छा हुआ कि हम किसी सामन्ती लफ्ज का इस्तेमाल नहीं करते, चलो अच्छा है कि हम कांग्रेस में नहीं है, अब तो भविष्य में भी नहीं जाना है, नही ंतो पता चलेगा कि चौबे जी छब्बे बनने गये थे और दुबे बन कर लौट आये यानि रही बची नाक और दुम कटा कर नकटा और दुमकटा भई हमें तो नहीं बनना ! ना बाबा ना ! कतई ना !

खैर यह कोई नई बात नहीं कांग्रेस ऐसे औंधे सीधे काम पहले से ही करती आयी है उसके लिये भगवान श्री राम एक काल्पनिक व्यक्ति थे, महाभारत एक काल्पनिक युध्द था ! होगा भई होगा कांग्रेस के लिये होगा, हमारे तो पुरखों ने लड़ा है सो भईया हम तो मानेंगे, मानेंगे मानेंगे !

चलो हमारी बात हम तक ठीक है वह तो खैर है कि भारत के कुछ राजपूत अपना उपनाम नहीं लिखते जैसे उ.प्र. के कुछ हिस्सों में कई राजपूत महज सिंह लिखते हैं यही हाल कुछ और प्रदेशों में भी है !

मेरे ख्याल से टाइटलिंग अक्सर वे करते हैं जो जनाना चाहते हैं और जताना चाहते हैं कि वे किसी राजघराने से हैं या राजपूत हैं या दो नंबर के राजपूत हैं (दो नंबर के राजपूत- यह राजपूतों का कोडवर्ड है भई इसका अर्थ है गुलाम राजपूत या मीठा पानी या जिनके खानदान में गड़बड़ आ गयी है) या नकली या फर्जी राजपूत जिन्हें बताना पड़ता है कि वे राजपूत हैं या वे कहीं के राजा रहे हैं ! कांग्रेस में कुछ ज्‍यादा ही नकली और फर्जी राजे रजवाड़े हैं जिनका काम स्‍वतंत्रता संग्राम में अंग्रेजों का साथ देना और उनकी चमचागिरी व जी हुजूरी करना ही था (हम नहीं कहते भारत का इतिहास कहता है) इन लोगों ने भारतीय स्‍वतंत्रता सेनानीयों और क्रान्तिकारीयों की अंग्रेजों के साथ मिलकर या उनका साथ देकर हत्‍यायें कीं और देश को आजाद होने में तकरीबन 100 साल (1857 से 1947 तक) लगवा दिये 1 देश के ये गद्दार आज कांग्रेस की ही शान नहीं बल्कि भारत के महान व माननीय हैं , इसीलिये कांग्रेस कहती है कि आजादी की लड़ाई से उसका रिश्‍ता रहा है, हॉं सत्‍य है आजादी की लड़ाई के गद्दारों की फौज उसके पास है । अभी हाल ही में महारानी लक्ष्‍मीबाई का बलिदान दिवस 18 जून को गुजरा, आजादी की लड़ाई से रिश्‍ता बताने वाली कांग्रेस के किसी भी सिपाही को शहादत साम्राज्ञी का नाम तक स्‍मरण करने की सुध नहीं आयी , आखिर आती भी क्‍यों महारानी लक्ष्‍मीबाई का कोई वंशज कांग्रेस में नहीं है , हॉं महारानी लक्ष्‍मीबाई की शहादत जिसके कारण हुयी वह गद्दार जरूर कांग्रेस में है और माननीय एवं कांग्रेस के कर्णधार हैं । आप नहीं जानते तो बता देते हैं कि एक फर्जी रजवाड़ा ऐसा भी है जिसे महारानी लक्ष्‍मीबाई के शहादत स्‍थल पर जाने की इजाजत नहीं है । और कांग्रेस यानि आजादी की लड़ाई वाली कांग्रेस का सच्‍चा सिपाही है । मालुम है क्‍यों .......नहीं तो पता लगा लीजिये । शायद इसीलिये कांग्रेस को भारत के असल इतिहास से चिढ़ है और उसे बार बार बदलने और तोड़ने मोड़ने मरोड़ने की नौटंकी रचती रहती है । उसका वश चले तो भारत का इतिहास पूरी तरह खत्‍म ही कर डाले, यहॉं की सांस्कृतिक एवं ऐतिहासिक परम्‍परायें पूरी तरह नेस्‍तनाबूद कर डाले । भगवान राम, भगवान श्री कृष्‍ण, राजा हरिश्‍चन्‍द्र, महाराणा प्रताप सब के सब काल्‍पनिक मिथक हैं 1      

हालांकि आज न राजा रहे न रजवाड़े मगर राजा रजवाड़े और राजपूत के नाम पर कई लोग ऐश फरमा रहे हैं, आज तक राज कर रहे हैं ! मौज मार रहे हैं ! अधिकांशत: इनमें फर्जी या नकली राजा हैं ! जिनका राजवंश या कुल गोत्र खानदान या रजवाई से कोई ताल्लुक नहीं रहा ! मगर आज तो जलजला ऐसे नकली राजाओं का ही है !

कुछ उपाधियां या नाम प्रतीक सामन्ती नहीं होते

अब जब बात छिड़ी है तो लगे हाथ बता दें कि कुंवर, राज, श्रीमंत आदि जैसे पूर्व नाम सम्बोधन सामन्ती नहीं हैं ! भारत के हिन्दू समाज में चाहे वह जाति से बनिया हो या चमार हो या भंगी हो या गूजर हो या ब्राह्मण हो या राजपूत हो अपने दामाद या बिटिया के पति को हमेशा ही कुंवर साहब ही कह कर संबोधित करते हैं यहॉ तक कि पूरा गॉंव ही किसी भी जाति के दामाद को कुंवर साहब ही कह कर बुलाता है या गाँव मजरे में बाहर के मेहमान को कुंवर साहब ही कहा जाता है यह एक सम्मान का श्रेष्ठ आदर देने का एक प्रतीक उल्लेख है न कि सामन्ती प्रतीक ! पता नहीं किस बेवकूफ ने कुंवर जैसे नित्य प्रयोगी शब्द को सामन्ती बता दिया ! पहले तो उस बेवकूफ को ढंग से हिन्दी सीखनी चाहिये फिर भारतीय हिन्दू समाज, संस्कार व सभ्यता को जानना चाहिये !

मेरे गाँव में एक युवक है जिसका नाम है कुमरराज या अधिक शुध्द हिन्दी में कहें तो कुंवर राज ! बेचारा गरीब किसान है सबेरे खा ले तो शाम का हिल्ला नहीं ! उसकी तो ऐसी तैसी हो गयी ! इसे तो गारण्टी से जिन्दगी में कांग्रेस में एण्ट्री नहीं मिलेगी ! भारत के गाँवों में हजारों लाखों कुअर सिंह, कुंवर सिंह, कुवरराज भरे पड़े हैं कांग्रेस के लिये ये अछूत हो गये !

श्रीमंत शब्द भी सामन्ती नहीं है भाई ! या तो आप सही हिन्दी नहीं जानते या फिर हिन्दू समाज के बारे में अ आ इ ई नहीं जानते ! हिन्दूओं में किसी को भी श्री लगा कर सम्बोधित करना बहुत पुराना रिवाज है और श्री का अर्थ होता है लक्ष्मी ! श्री और मन्त को मिलाने पर बनता है श्रीमन्त अर्थात लक्ष्मीमन्त या लक्ष्मीवन्त या लक्ष्मीवान यानि अति धनाढय व्यक्ति यानि श्रीमंत बोले तो नगरसेठ !

श्रीमंत शब्द राजा या रजवाड़े का प्रतीक नहीं है बल्कि अधिक पैसे वाले का द्योतक है ! श्रीमंत शब्द ग्वालियर के सिंधिया परिवार के लिये प्रयोग किया जाता रहा है ! और जिसका साफ अर्थ है कि अति धनाढय होने के कारण इस परिवार को श्रीमंत कह कर पुकारा गया न कि राजा या सामन्ती कारणों से !   

एक कहानी - नाम में क्या धरा है

एक बहुत पुरानी कहानी है, हिन्दी में है और लम्बे समय तक स्कूलों में पढ़ाई जाती रही है जिसका शीर्षक है - नाम में क्या धरा है ! कांग्रेस को इसे पढ़ना चाहिये !

साथ ही यह भी पढ़ना चाहिये -

जात न पूछो साधु की, पूछ लीजिये ज्ञान !

मोल करो तलवार का पड़ी रहन दो म्यान !!

वैसे मेरे विचार में कांग्रेस शायद कुछ और करना चाहती होगी लेकिन भटक गयी और कर कुछ और बैठी ! कांग्रेस की सबसे बड़ी समस्या सामन्ती प्रतीक या सामन्तीक नामोल्लेख नहीं बल्कि उसके नेताओं का सामन्ती रवैया एवं आचरण है ! उसके पास नेता कम और चमचे ज्यादा हैं ! उसके जो चन्द नेता हैं उन्हें रूआब जमाने और चमचे पालने का खासा शौक है ! कांग्रेस में टिकिट तक किसी न किसी की चमचागिरी से ही मिलता है ! और उसका नेता जो कि अपने खास व अंधे चमचे को टिकिट दिलाता है ! पॉच साल तक उसके चुन लिये जाने के बाद भी उसे नेता नहीं बनने देता बल्कि चमचा बनाये रखता है और अपने दरवाजे पर ढोक बजवाता है !

ग्वालियर चम्बल में आप जैसे ही कांग्रेस टिकिटों की बात करते हैं तो हर चुनाव में पत्रकार पहले ही अखबारों में संभावित नाम उछाल देते हैं और कांग्रेस के उम्मीदवार बता देते हैं ! क्या आप बता सकते हैं कि ऐसा कैसे होता है ! ग्वालियर चम्बल के पत्रकार इसका अधिक सटीक उत्तर दे सकते हैं, पत्रकार अपनी पैमायश का फीता योग्यता या निष्ठा या पात्रता के आधार पर नहीं बल्कि चमचागिरी के आधार पर तय करते हैं और यह जान लेना बड़ा आसान है कि कौन कितना बड़ा चमचा है ! जो जितना बड़ा चमचा उसकी दावेदारी उतनी ही अधिक मजबूत !

जो चमचा है वह नेता कैसे हो सकता है , चमचा तो सदा चमचा ही रहेगा वह नेता कभी नहीं बन सकता, इसलिये अभी तक ग्वालियर चम्बल में कांग्रेस नेता पैदा नहीं कर सकी ! चमचों को नेता बनाना एक असंभव काम है  ! जो कांग्रेस से बाहर रहे वे नेता बन गये ! हाल के विधानसभा और लोकसभा चुनाव परिणाम इसका स्पष्ट जीवन्त उदाहरण हैं !

कांग्रेस को सही मायने में लोकतंत्र लाना है तो सामन्ती प्रतीक या नामोल्लेखों के पचड़े से दूर अपने नेताओं के सामन्ती आचरण व व्यवहार से छुटकारा पाना होगा, चमचे पालने वाले नेताओं को हतोत्साहित करना होगा ! चमचे हटेंगे तो नेता अपने आप आ जायेंगे ! नेता किसी का चमचा नहीं हो सकता, नेता चाहिये तो चमचे खदेड़िये ! नेताओं के सामन्ती आचरण व व्यवहार को सुधारिये ! फिर आपको जरूरत ही नहीं पड़ेगी तथाकथित नाम प्रतीक उल्लेखों को रोकने की ! चमचे ढोक बजाना बन्द कर देंगें तो कांग्रेस का खोया रूतबा लौट आयेगा ! वरना गालिब दिल बहलाने को खयाल अच्छा है !

चमचा में गुन बहुत हैं सदा राखिये संग , सदा राखिये संग, काम बहुत ही आवें !

गधा होंय बलवान प्रभु भगवान बचावे, डाके डाले पापी जम के कतल करावे !!

चरणन चाटे धूल, चमचा महान बतावे, खुद ही जावे भूल मगर सबन को गैल बतावे !!

Monday, April 13, 2009

व्‍यंग्‍य - चुनाव में उम्मीदवारों के लिए ऐसा हो फॉर्म

व्‍यंग्‍य - चुनाव में उम्मीदवारों के लिए ऐसा हो फॉर्म
6 Apr 2009, 1832 hrs IST,
नवभारतटाइम्स.कॉम  

 

दिल्‍ली से प्रकाशित नवभारत टाइम्‍स ने एक मजेदार व जोरदार चीज छापी है, हम इसे यहॉं साभार उद्धृत कर रहे हैं । हालांकि हमारी समझ से इसमें दो एक कालम और जोड़ने चाहिये थे मसलन चमचा गिरी का अनुभव और हॉं जी हॉं लगातर बोल पाने के क्षमता, दल बदलने का आवृत्ति काल वगैरह । नीचे यह यथावत साभार उद्धृत है -  

 

तमाम विरोधों के बावजूद इस बार भी आपराधिक बैकग्राउंड वाले कई उम्मीदवार चुनावी मैदान में हैं। पार्टियों ने भी बस वोट बटोरने के लिए आंख मूंदकर ऐसे लोगों को टिकिट थमा दिए हैं। अब जब चुनाव में ऐसे उम्मीदवारों की भरमार हो तो, उनके लिए फॉर्म भी कुछ अलहदा होना चाहिए ! हमारे एक पाठक ने लोकसभा चुनाव के उम्मीदवारों के लिए एक ऐसा ही फॉर्म बना डाला। जरा गौर फरमाइए इस फॉर्म पर...

 

लोकसभा चुनाव के उम्मीदवारों के लिए फॉर्म

1. उम्मीदवार का नाम

2. वर्तमान पता

a. जेल का नाम

b. कोठरी नंबर

3. राजनीतिक पार्टी (पिछली पांच पार्टियों का नाम लिखें)

4. लिंग

a. पुरुष

b. महिला

c. इनमें से कोई नहीं

5. राष्ट्रीयता

a. इटैलियन

b. भारतीय

6. पिछली पार्टी छोड़ने का कारण (एक या उससे ज्यादा ऑप्शन चुन सकते हैं)

a. दलबदल किया

b. निकाले गए

c. मुझ खरीद लिया

d. इनमें से कोई नहीं

e. उपरोक्त सभी

7. चुनाव लड़ने का कारण (एक या उससे ज्यादा ऑप्शन चुन सकते हैं)

a. पैसा कमाने के लिए

b. कोर्ट केस से बचने के लिए

c. ताकत के बेजा इस्तेमाल के लिए

d. जनता की सेवा के लिए

e. मुझे पता नहीं

* यदि आपने चौथा ऑप्शन चुना है तो सरकार से मान्यता प्राप्त मनोचिकित्सक से अपनी मानसिक स्थिति सामान्य होने का प्रमाणपत्र लगाएं

8. आपको जनसेवा का कितना तजुर्बा ह ?

a. 1-2 साल

b. 2-6 साल

c. 6-15 साल

d. 15 साल से ज्यादा

9. आपके खिलाफ लंबित आपराधिक मामलों का ब्यौरा दें (इसका जवाब लिखने के लिए आप जितने चाहें उतने पन्ने अलग से लगा सकते हैं)

10. आपने जेल में कितने साल बिताए है ? ( सवाल नं. 8 से यह अलग है)

a. 1-2 साल

b. 2-6 साल

c. 6-15 साल

d. 15 साल से ज्यादा

10. क्या आप किसी वित्तीय घोटाले में शामिल है ?

a. क्यों नहीं

b. बेशक

c. जी हां

d. मैं इससे इनकार करता हूं

e. इसमें विदेशी साजिश का हाथ है

11. भ्रष्टाचार से आपकी सालाना आमदनी कितनी ह ?

a. 100-500 करोड़

b. 500-1000 करोड़

c. गिनना मुश्किल है

( ृपया हवाला आदि से विदेशी मुद्रा में हुई आमदनी को रुपये में लिखें)

13. क्या भारत के विकास के लिए आपके पास कोई योजना ह ?

a. नहीं

b. नहीं

c. नहीं

d. नहीं

14. अपनी उपलब्धि नीचे दिए गए ब्रैकिट में लिखें

(...........)

दस्तखत नहीं कर सकते तो यहां अंगूठा लगाएं

 

Monday, March 16, 2009

व्‍यंग्‍य/ मसखरे नेताजी, पोल पोलिंग की भाग-1 चुनाव से जुड़ी रोचक बातें, क्‍या वाकई जीता हुआ उम्‍मीदवार जनप्रतिनिधि होता है

व्‍यंग्‍य/ चुनाव से जुड़ी रोचक बातें, क्‍या वाकई जीता हुआ उम्‍मीदवार जनप्रतिनिधि होता है

नरेन्‍द्र सिंह तोमर ''आनन्‍द''

मसखरे नेताजी, पोल पोलिंग की भाग-1

विशेष टीप-  गणित की 7 प्रमेय विशेष प्रसिद्ध रहीं हैं, जिन्‍हें विश्‍व में कभी कोई गणितज्ञ हल नहीं कर पाया । इन प्रमेयों को भारत के रेल्‍वे के एक मामूली और नाकारा समझे जाने वाले रोजाना बेइज्‍जत किये छोटे से क्‍लर्क रामानुजम ने हल करके रद्दी के यानि कचरे के डिब्‍बे में फेंक दिया था । जो कि विश्‍व प्रसिद्ध गणितज्ञ को नजर आयीं तों उसने रामानुजम को विश्‍व का महान गणितज्ञ नवाजा । स्‍वामी विवेकानन्‍द की कहानी भी कोई भिन्‍न नहीं हैं । उन महान विद्वानों को नतमस्‍तक होते हुये मैं भी ऐसी अबूझ 7 चुनावी प्रमेय अर्थात समस्‍यायें यानि पहेलियॉं प्रस्‍तुत करने की धृष्‍टता कर रहा हूँ जो अभी तक अनसुलझीं हैं, जो इन्‍हें सुलझायेगा निसंदेह भारत के इन दोनों रत्‍नों यानि भारत रत्‍न (अभी तक ये महान भारतीय भारत रत्‍न से नहीं नवाजे गये हैं क्‍योंकि ये राजनीतिज्ञ नहीं थे, न इनका कोई रिश्‍तेदार कभी विधायक या सांसद ही बन पाया) की टक्‍कर का मेरी नजर में महान भारतीय, पूज्‍य भारतीय होगा ।     

क्‍या आपने कभी ध्‍यान दिया है कि आपके यहॉं के निर्वाचन क्षेत्र से कुल कितने उम्‍मीदवार चुनाव में खड़े हुये और उनमें से हरेक को कितने कितने वोट मिले ।

आईये भारतीय लोकतंत्र की कुछ मजेदार रोचक बातों पर मुलाहिजा गौर फरमायें ।

मान लीजिये कि एक विधानसभा या एक लोकसभा चुनाव सम्‍पन्‍न हुआ और चुनाव में कुल 16 प्रत्‍याशी खड़े हुये जिसमें इस क्षेत्र में कुल मतदाताओं की संख्‍या 500 है । जब चुनाव हुआ तो कुल 480 लोगों ने वोट डाले ।

चुनाव में हर मतदाता ने अपनी अपनी पसन्‍द का वोट डाला यानि अपने मनपसन्‍द प्रत्‍याशी को वोट किया ।

मतगणना हुयी और चुनाव परिणाम मान लीजिये कि निम्‍न प्रकार रहा %

 

क्रमांक

प्रत्‍याशी

प्राप्‍त मत    

1.     

रामलाल

212

2

मनोहर सिंह

37

3

रामकली

10

4

लालूराम

5

5

करियाचन्‍द

50

6

रामनिवास

30

7

छिद्दी लाल

21

8

ओमवीर सिंह

11

9

रामबेटी

9

10    

राजकुमारी

4

11    

धनियाराम

3

12    

सेठ गिरधारी लाल

5

13    

केशव चन्‍द्र

16

14    

गिरवरलाल

18

15    

धनुई

40

16

करोड़ीमल

9     

कुल वोट

 

480

 

अब ऊपर की सारणी के मुताबिक सर्वाधिक 212 वोट पाने वाला प्रत्‍याशी रामलाल है ।

कुल वोट चूंकि 480 पड़े हैं जिसका आधा यानि 50 फीसदी 240 होता है अर्थात क्षेत्र के आधे से अधिक मतदाताओं ने रामलाल को वोट नहीं दिया । केवल 212 लोगों ने रामलाल को वोट दिया है । इस प्रकार रामलाल केवल 212 लोगों का प्रतिनिधि सिद्ध हुआ । और 480 में से 212 घटाईये तो प्राप्‍त संख्‍या 268 होती है । अत: सिद्ध हुआ कि विजयी प्रत्‍याशी रामलाल 268 लोगों यानि मतदाताओं का प्रतिनिधि नहीं हैं ।

अब जिन 268 लोगों ने रामलाल को वोट नहीं दिया उनका रामलाल किस हिसाब से प्रतिनिधि कहलायेगा । क्‍या रामलाल उनका प्रतिनिधि माना जाना चाहिये । क्‍या वे 268 मतदाता जिन्‍होंने रामलाल को वोट नहीं दिया, रामलाल को अपना प्रतिनिधि मानेंगें । या रामलाल के पास अपनी समस्‍या लेकर जायेंगें ।

नहीं कदापि नहीं, वे कतई रामलाल को अपना प्रतिनिधि नहीं मानते इसलिये उन्‍होंने रामलाल को वोट नहीं दिया । अब इन 268 लोगों पर भी रामलाल को उनका जनप्रतिनिधि कह कर थोपा जाना क्‍या उचित है । क्‍या वे 268 मतदाता अगले 5 वर्ष तक बिना प्रतिनिधि के भारत के लोकतंत्र में रहेंगे । (वर्तमान व्‍यवस्‍था में तो रह रहे ही हैं) क्‍या रामलाल के खिलाफ आये 268 वोट उसके मिले 212 वोटों से अधिक नहीं हैं । क्‍या वाकई इस तरह रामलाल जीता या हारा । फिर रामलाल को समूचे क्षेत्र का जनप्रतिनिधि कैसे माना जाये । ये 268 लोग तो 5 साल तक रामलाल से मिलने तक नहीं जायेंगें, और रामलाल भी हरेक को इन 268 में ही गिनेगा और अधिकतर (चेले चमचों को छोड़ कर ) लोगों को सुनेगा ही नहीं । देश में यही चल रहा है कि नहीं ।    

चलिये आप इस पहेली को सुलझाईये, मैं दूसरी पहेली तब तक आपको देता हूँ । और विचार करिये कि कितना निर्दोष और निष्‍पक्ष है हमारा निर्वाचन और कितनी वोट पावर से समृद्ध या कमजोर (ऋणात्‍मक)होता है हमारा जनप्रतिनिधि । इस पहेली को बूझें तो जानें । या फिर वर्तमान या पूर्व विधायक या सांसद या चुनाव लड़ने के इच्‍छुक भावी सांसद या विधायक से इसका समाधान अवश्‍य पूछें । और मुझे अवश्‍य बतायें, मैं इसका समाधान अवश्‍य प्रकाशित करूंगा ।  

 

क्रमश: जारी....

Tuesday, February 10, 2009

सपना 85 का, आस कम्‍प्‍यूटर की, कहर बिजली का, चैलेन्‍ज मामा का

हास्‍य/ व्‍यंग्‍य

सपना 85 का, आस कम्‍प्‍यूटर की, कहर बिजली का, चैलेन्‍ज मामा का

नरेन्‍द्र सिंह तोमर ''आनन्‍द''

जगत मामू यानि जग मामा भनजों से बोले चलो बच्‍चो एक खेल खेलते हैं । जो जीतेगा वो एक क्‍म्‍प्‍यूटर पावेगा 500 रू. वाला इनाम में । हारा तो ठेंगा ।

बच्‍चे बोले वाह मामू क्‍या धांसू आइडिया है, हर्र लगे न फिटकरी रंग चोख आ जायेगा, केन्‍द्र सरकार नये नये आइटम निकाले है, ओर मामू अपनी सील उसी पे ठोक के मेड इन मामूज फैक्‍ट्री ठोक देवे है । खैर अब दान की बछिया के दॉंत तो नहीं देखे जावें हैं । फोकट में मिले तो 500 वाला भी चलेगा । मामू कौन कम उस्‍ताद थे, अपने पावर की मेन चाबी नीचे डाली और उड़ा दी बिजली, ससुरी रात गोल पूरी दिन भर गोल देखें भानजे कैसे अब लाओगे 85 परसेण्‍ट, नहीं लाये तो ठेंगा ।

बच्‍चों को टेंशन, सारी रात टेंशन सारा दिन टेंशन । अब मामू ने इनाम भी रख दी बत्‍ती भी गोल कर दी । अब पचासी तो का पास होइवे के लाले पड़ रहे हैं । आखिर एक भानजा तैश में आ ही गया उसने टी.वी पर एडवर्टाइज देखा, अमिताभ बच्‍चन चाचू बोल कि टेंशन गया पेंशन लेने, भानजा चाचू के डायलॉग पे प्ररित हो गया । और एक अखबार में छपी खबर के मामू को चिठ्ठी लिखो तो मामू बुला लेता है सो लिख डाली फटाफट एक पत्री मामा के नाम । बच्‍चे ने जो लिखा

प्‍यारे मामू जान, तुम पर बिजली कुर्बान ।

बड़े दिनों से कोई नई इनामो इकराम नहीं आ रही थी न कोई पंचायत फंचायत नहीं हो रही थी सो लग ही नहीं रहा था कि मामू की सरकार लौट आयी है । न पत्‍थर गाड़ कर कब्रिस्‍तान बनाये जा रहे थे और न साइकिल से पेट्रोल बचाने मामू दफ्तर जा रहे थे, न कहीं भुक्‍खड़ सम्‍मेलन करा कर अनाज बांटे जा रहे थे, न कोई यात्रा फात्रा का टोटका हो रहा था । हमें लग रहा था मामू गद्दी पे जाके हमें भूल गये, बिसरा गये ।

पर मामू कमाल कर दिया अपने बिजी टैम में से थोड़ा बखत भानजों के लिये निकाल कर उन्‍हें 500 रू वाला ही सही कम्‍प्‍यूटर दे डालने का खेल खेलने का हम भानजों के साथ बढि़या फनी गेम शो चालू कर डाला और ठेले रिक्‍शे वालों को भी सरकारी हलवा का जलवा खिला दिया, हॉं अब कुछ कुछ यकीन हुआ कि मामू जान ही हैं, लौट कर सत्‍ता में आये हैं, जमूड़े बनाने और तमाशा दिखाना चालू कर दिये हैं । थैंक्‍यू मामा जी ।

मामा आपकी शर्त 85 परसेण्‍ट से ऊपर लाने की थी, पर मामू मैं और मेरे सारे दोस्‍त आपकी क्राइटिरिया एल.ओ.सी. से आउट हो गये हैं, अब हम 85 तो क्‍या पास ही हो लें तो आपकी दया से बहुत होगा । हमारे यहॉं सारी रात बिजली नहीं रहवे है, सारे दिन भी अँधेरा छाया है, मोमबत्तियां खरीद खरीद कर पागल हो गये हैं, मम्‍मी पापा की जेब भी जवाब दे गयी है, एक मोमबत्‍ती आधा पौन घण्‍टे संग देती है और बिजली सारी रात गुल रहती है, सारा दिन गुल रहती है, अबकी बार गणित में ऐसे ही सवाल पूछोगे तो शायद हम पास भी हो जायें जैसे एक मोमबत्‍ती 40 मिनिट तक जलती है जिसका दाम 2 रू है और बिजली 23 घण्‍टे गुल रहती है तो बताओ कि एक दिन में कितनी मोमबत्तियां लगेंगीं और एक दिन का खर्च कितना आयेगा । मामू जान ऐसे सवाल हमें अब खूब रट गये हैं, हम फटाक से सवाल का उत्‍तर दे देंगें, कोर्स के सवाल तो मामू अब पढ़ नही पाते सो मामू ऐसे सवाल पूछ कर ही हमारा बेड़ा पार करा देना नहीं तो मामू हम सारे के सारे ही फेल हो जायेंगें ।

मामू अब कम्‍प्‍यूटर तो हमारी पकड़ से निकल गया आपका चैलेन्‍ज कि बेटा बिना बिजली के लाओ 85 परसेण्‍ट और पाओ कम्‍प्‍यूटर, ये हमारे बूते का नहीं है । आपका चैलेन्‍ज हम वापस करते हैं, अब तो पास ही हो लें तो साल बच जायेगा वरना मामू आपका ये गेम शो हम गॉंव शहर के गरीब बच्‍चों की कूबत से बाहर है ।

मामू थोड़ा लिखा, बहुत समझना । आपका प्‍यारा भानजा अपने कई साथियों के साथ ।

मामू को चिठ्ठी मिली तो मामू ने भानजे को बुलवा भेजा और भानजे से कहा कि देखो बेटा, बिजली ने गरीब मोमबत्तियां बनाने वालों की रोजी रोटी छीन ली, हमने उन्‍हें रोजगार मुहैया कराया, गरीब इन्‍वर्टर और बैट्री वालों को धन्‍धा दिलाया । ऊर्जा की खपत और बचत पर अब तुम्‍हें निबन्‍ध नहीं रटने पड़ेंगें । भ्रष्‍टाचार खतम करने आ रहे कम्‍प्‍यूटर और आई.टी. तथा ई गवर्नेन्‍स हमने एक ही वार से बिजली काट कर मामला ही जड़ मेख से मिटा दिया ससुरी न बिजली न आई.टी. न कम्‍प्‍यूटर न पचासी परसेण्‍ट हमने एक झटके में सबके टेंशन दूर कर दिये । भ्रष्‍टाचार खतम हुआ तो देश में ग्‍लोबल मन्‍दी छा जायेगी, सरकार की और सरकारी कारिन्‍दों की कमाई ही ठप्‍प हो जायेगी । सब टेंशनों की जड़ ये बिजली थी । हमने बिजली काट दी सारे टेंशन खतम कर दिये । तुमने कहावत तो सुनी ही होगी कि न नौ मन तेल होगा न राधा नाचेगी सो प्रिय भानजे न बिजली होगी न भ्रष्‍टाचार खतम होगा, न आई.टी. आवेगी न कम्‍प्‍यूटर, हमने भयमुक्‍त म.प्र. का वायदा किया था हमारे सरकारी कर्मचारी सबसे ज्‍यादा भयभीत पारदर्शिता लागू होने और भ्रष्‍टाचार के खात्‍में से थे हमने उन्‍हें बिजली काट कर भयमुक्‍त कर दिया । रहा बेटा तुम्‍हारे पास और फेल होने की बात । सो चुनाव परिणामों की तरह हमने परीक्षा परिणाम भी सैटल कर लिये हैं । कहॉं कौन पास होगा और कौन फेल, कौन पच्‍चासी लायेगा कौन ज्‍यादा लायेगा कौन कम्‍प्‍यूटर पावेगा कौन इस गेम शो में हारेगा और किसको ठेंगा मिलेगा सब कुछ सैटल्‍ड है बेटा जा अब घर जा और चद्दर तान कर टॉंग पसार कर सो तेरे 85 से ऊपर आ जायेंगें तू चिन्‍ता मत कर । तुझे कम्‍प्‍यूटर मिल जावेगा । अब ज्‍यादा भभ्‍भर मचा कर हमारी गेम शो की ऐसी तैसी मत कर ।

भनजा बोला कि पर क्‍या मामू ये गलत नहं होगा । मामू बाले कि बेटा देश में ये रोज ही हो रहा है । हर गेम शो में हो रहा था लो जमूड़े बन रहे हैं, मदारी जमूड़े बना रहे हैं, मैं तो केवल उनके चरण चिह्नों की धूलमात्र ही ले रहा हूँ ।

भानजा खुशी खुशी बिना पढ़े लिखे ही कम्‍प्‍यूटर मिलने के सपने लेकर अपने घर लौट आया ।

Sunday, February 1, 2009

हास्‍य / व्‍यंग्‍य// का चचा चुनाव लड़बे को मन है का ....चलो एम.पी. आ जाओ चचा

हास्‍य / व्‍यंग्‍य

का चचा चुनाव लड़बे को मन है का ....चलो एम.पी. आ जाओ चचा

नरेन्‍द्र सिंह तोमर ''आनन्‍द''

अब चुनावी चचा का टैम पूरा होइबे का बखत आ गया । जब बखत आ जाता है तो बड़े बड़े बौरा जाते हैं । अर्गल का टैम पूरा हुआ तो वे भी बौरा गये, करोड़ों की करारे नोटो की गडडी संसद में लहरा आये । सोचा कि मुरैना जनरल हो गयी अम्‍बाह असेम्‍बली या भिण्‍ड लोकसभा लायक तो बौरा ही लें । अम्‍बाह में तो काम नहीं बना अब भिण्‍ड लोकसभा की आस में अबई तक बौराये हैं ।

साला फागुन का महीना बड़ा विकट होता है, अच्‍छे अच्‍छे बौरा जाते हैं आम के पेड़ पर तो बाकायदा बौर आ जाता है वह भी बौरा जाता है । मगर नेता लोग और अफसर तो बसन्‍त ऋतु में बौराते हैं,  बौराना इण्डिया की संस्‍कृति है, हर भारतीय जब तक बौराता नहीं, लगता ही नहीं कि वह भारत का बेटा है ।

शेषन साहब भी बौराये थे उन्‍हें भी राजनीतिज्ञों के चुनाव कराते कराते राजनेता बनने और चुनाव लड़ने का चस्‍का लगा था । जिनके फेवर में सब कुछ किया उन्‍हींने उन्‍हें टिकिट नहीं दिया फिर भी पतली गली से चुनावी चचा शेषन ने अपनी हसरत पूरी करने की कोशिशें कीं । अब ये दीगर बात है कि कामयाबी ने कदम नहीं चूमे । वे भी अपने बखत पूरा होते होते खूब बौराये खूब चिल्‍लाये कि मेरा रंग दे बसन्‍ती चोला । पर बसन्‍ती चोला तो क्‍या किसी मुये राजनेता ने उन्‍हें पीला रूमाल तक नहीं दिया ।

अब ये चुनावी अखाड़ा मण्‍डल की गद्दी में ही खोट है तो क्‍या कहिये, जो भी बैठे है, बौरा जावे है । गलत है, कुछ न कुछ तो गद्दी में गड़बड़ है, हमें तो लगे है कि पाकिस्‍तान का हाथ होवे है, जॉंच करवानी चाहिये । अब सुनी है कि चावला साहब का बखत आ रहा है, भईया चावला साहब आप अभी तक ठीक ठाक हो, जरा संभल कर रहना, गद्दी गड़बड़ है कहीं बौरा मत जाना ।

हमारे मुरैना में एक बड़ी दिलचस्‍प बात है कि  आप पिछले तीस बरस का इतिहास देखेंगें तो पायेंगें कि किसी भी प्रायवेट स्‍कूल में जो भी मास्‍टर नौकरी करने गया, और स्‍कूल मालिक की रंगदारी जो देखी वह प्रभावित हो गया और अगले ही सत्र में उसने खुद का स्‍कूल खोल लिया । गोया सिचुयेशन कुछ ऐसी हो गयी कि एक दिन ऐसा आया कि मुरैना के हर अगल और बगल में स्‍कूल कोचिंग हो गये । हमारे कलेक्‍टर साहब महेश कुमार अग्रवाल साहब अभी एक दिन एक कार्यक्रम में बोल रहे थे कि जबलपुर जैसे महानगर में भी शीर्ष प्रतियोगी परीक्षाओं में कम लोग निकल पाते हैं मगर मुरैना जैसे छोटे शहर से प्रतिभाओं की ऑंधी तूफान सा निकलता है और केवल तूफान नहीं बल्कि टॉपर्स का शहर कहें तो सही होगा ।

अब कलेक्‍टर साहब इत्‍ता तो समझ ही गये कि चम्‍बल टापर्स की जन्‍मदात्री है मगर इन टापर्स के पीछे गरीबी, संघर्ष और बिना सुविधा साधन पढाई लिखाई करने बिना बिजली, दिये (दीपक) और मोमबत्‍ती से किताबों में ऑंखे फोड़ने का भी एक विकट और पवित्र इतिहास है । खैर असल बात ये है कि अगल बगल और सब बगल में खुले एजुकेशन सेल सेण्‍टर्स पर भी तो नजर डालिये, जो भी एक बार मास्‍टरी कर आया वही अगले सत्र में अपनी खुद की दूकान खोल कर प्रिंसिपल बन गया ।

बस बस चुनावी चचा को भी कुछ ऐसा ही बुखार जान पड़े है, अब बखत पूरा हो रहा है तो फुर्सत में का करेंगें । बहुत लड़ा लिया अब खुद ही लड़ लो । अब चचा जब लड़ने की ठान ही लिये हो तो का पता बसन्‍ती, केसरिया या रंग बिरंगा टिकिट दे कै न दे, ऐसा करो कि चम्‍बल में आ जाओ । यहॉं चुनाव जीतना आसान है । बस थोड़ी सी सेटिंग बिठानी पड़ेगी बस समझ लो निकल गयी सीट केवल तीन बार वोट काउण्टिंग में बिजली कटेगी, और हरी हराई सीट निकल जायेगी । और इलेक्‍शन कमीशन के डिस्‍पले बोर्ड पर शाम तक मनवांछित परिणाम नहीं घोषित होने तक रिजल्‍ट पॉज बने रहेंगें । जब आप विजयी घोषित होकर आपत्ति दाखिल करने का वक्‍त निकल जायेगा तब इलेक्‍शन कमीशन के लाइव डिस्‍पले पर रिजल्‍ट शो होंगें । बकाया तो सारे गुण्‍ताड़े जानते ही हो, मतलब ई.वी.एम. में कैसे गड़बड़ करनी है, डाकमत की गिनती कैसे करानी है, कैसे विरोधी पार्टी के प्रभाव क्षेत्र में ई.वी..एम. पर नाम उलट पुलट पर्ची लगानी है । बटन में करण्‍ट की खबर फैलाना वगैरह वगैरह, कैसे वोटर्स की कुल संख्‍या से ज्‍यादा वोट ई.वी.एम. में से निकलने है । अरे चचा उस्‍ताद हो यार तुम्‍हें का बताये । चलो आ जाओ चम्‍बल में सीट निकलवा देंगें । पक्‍का एकदम सौ टके पक्‍का । 

 

Sunday, December 21, 2008

आओ चलो एक सेना बनायें, घर में दुबकें गाल फुलायें

हास्‍य/ व्‍यंग्‍य

       आओ चलो एक सेना बनायें, घर में दुबकें गाल फुलायें

नरेन्‍द्र सिंह तोमर ''आनन्‍द''

काने सों कानो मत कहो, कानो जागो रूठ । धीरें धीरें पूछ लेउ तेरी कैसे गई है फूट ।।  

मेरे एक मित्र देश में बढ़ रहे आतंकवाद और भ्रष्‍टाचार से काफी दुखित होकर मेरे पास आये, साथ में दस बीस पठ्ठे भी उनके साथ बंदूको से लैस होकर सरपंचों की जेड प्‍लस के मानिन्‍द उनके संग थे । उनमें आक्रोश और व्‍यथा दोनों ही गहराई तक समाई थी । आकर मुझसे बोले दादा ये सब क्‍या है, बस बहुत हो गया अब अपन को सबको मिल कर एक सेना बनानी है अब अपन सब खुल कर देश के लिये लड़ेंगें ।

मेरे मित्र जाति से राजपूत थे और संग में उनके ठाकुर बाह्मणों के छोरों की लम्‍बी चौड़ी टोली थी । मुझे उनकी ख्‍वाहिश जान कर कोई खास  हैरत नहीं हुयी । 26 -27 नवम्‍बर के बाद से सारे देश से ज्‍यादा गुस्‍सा चम्‍बल में है, और चम्‍बलवासीयों का वश नहीं चल रहा वरना रातों रात आतंकिस्‍तान का नक्‍शा गायब कर भारत में विलय कर 13 अगस्‍त 1947 की स्थिति बहाल कर देते ।

मैंने उन्‍हें फुसलाते हुये पूछा कौनसी सेना बनाना चाहते हो महाराष्‍ट्र वाली शिव सेना या मनसे वाली सेना । वे उतावले होकर बोले हम लक्ष्‍मण सेना बनायेंगें आप गौर कर लो, अंक फंक ज्‍योतिष फ्योतिष से टटोल टटूल कर चेक कर लेना, फिट नहीं बैठे तो राम सेना या लव कुश सेना या फिर हनुमान सेना कर लेना । बस दादा फायनल कर लो और हमारा नेतृत्‍व कर डालों ।

मैं उनके तैश तेवरों को देख चुपके से बोला भाई सिकरवार वो सब तो ठीक है लेकिन ये सेना फेना बनाना ठीक नहीं है, ससुरी सेना बदनाम बहुत हो गयीं हैं, वे बोले कैसे बदनाम हो गयीं हैं हम समझे नहीं । मैंने कहा कि वो जो ठाकरे की शिव सेना है, उसने कभी सेना वाला काम किया नहीं बस लोगों को मारने पीटने, चन्‍दा और हफ्ता वसूली करके सिनेमा के पोस्‍टर उखाड़ता फूंकता रहा है लेकिन नाम अपनी टोली का शिव सेना धर दिया ऐसे ही मनसे की शिव सेना बोर्डिंग होर्डिंग बदलवाने और उत्‍तर भारत के भइया लोगों को खदेड़ने में लगी रही तब तक साला पछांह (पश्चिम) से आतंकिस्‍तानी कूद परै, बिनें देख सारे सेना वारे सैनिक घरनि में दुबक गये और अपने अपने प्रान बचावत फिरे । फिर बेई (वही) गैर मराठी काम आये सो सारे आंतंकिस्‍तानीयन की रेल सी बनाया दयी । सो तबसे ये सेना फेना फर्जी घोषित होय गयीं हैं । काम तो असली सेना ही आवे है । बो ही खाली करवाय पाये है मराठीयन के मठन को ।

सिकरवार साहब बोले तो ठीक है सेना फेना रहन देओ कछू और बनाय लेउ । पर एक संगठन तो होनो ही चाहियें । सो हाल लठ्ठ फोर दे ।

खैर ऊपर लिखी एक ऐसी सच्‍चाई है जो बमुश्किल दो चार रोज पुरानी है और लगभग ऐसे ही हालात अमूमन समूचे देश में हैं । आतंकवाद पर गुस्‍साये एक नेता जी मेरे पास आये बोले कि ये कसाब को मारा क्‍यों नहीं जा रहा अफजल को फांसी पे क्‍यों नहीं लटकाया जा रहा । ये हमारे देश को हो क्‍या गया है । फटाफट एक्‍शन क्‍यों नहीं ले रहा, आतंकिस्‍तान पर हमला क्‍यों नहीं कर रहा ।

मैं उनके ताबड़तोड़ सवालों से बौखला सा गया । मैं बोला भईया नेताजी यार अब ये तो वह बात हो गयी कि पूछ लो सूचना के अधिकार में क्‍यों नहीं विवाह हो रहा, क्‍यों नहीं बच्‍चा हो रहा, क्‍यों नहीं जुड़वां हो रहे । यार कसाब को मारना था तो पकड़ा ही क्‍यों था, उसी वक्‍त ठोक देते, तब काहे नहीं ठोका, यार नेता जी तुम उस बखत कहां थे जब कसाब ताबड़तोड़ गोलियां बरसा रहा था और सेना वाले बिलों  में दुबके लाशों की चादर ओढ़कर प्राण बचाते भाग रहे थे, तब तुम्‍हीं पकड़ लेते कसाब को और ठोक देते उसी वक्‍त । अब तुकाराम जी अपनी जान देकर कसाब यानि कसाई मियां को जैसे तैसे एक कीमती सबूत के तौर पर हमें दे गये हैं तो आप कह रहे हो कि इसे म्‍यूजियम में सजाने के बजाय ठोक क्‍यों नहीं रहे, इसका इण्‍टरनेशनल यूज क्‍यों हो रहा है इसे फांसी क्‍यों नहीं चढ़ा देते ।

भाई नेताजी पहले एक कसाब को खुद पकड़ों फिर खुद ठोको या उसे ठोकने की बात करो, कहने में भी सुघर लगोगे और जनता को बात भी रूचेगी, वरना ढपोरशंखी ही बजोगे । पकड़े पकड़ाये पर नर्राना आसान है, टेंटूयें से सुरों के ताल उलीचना सहज है पर पकड़ना कठिन है, यह तो स्‍वर्गीय शहीद तुकाराम भाई बता सकते हैं कि उन्‍होंने अपने प्राण देकर भी पहली बार भारत के हाथ एक ऐसा ब्रह्मास्‍त्र दे दिया कि अब भारत कसाब के बल पर न केवल दुनियां के सामने छाती तान कर खड़ा है बल्कि डिफैन्‍स से निकल कर अटैक की सिचुयेशन में आ गया है । और आप कह रहे हो कि ठोक दो कसाब को, साले नेता जी यार तुम हिन्‍दुस्‍तानी हो कि आतंकिस्‍तानी । आतंकिस्‍तान की मदद करने वाली हर बात तुम्‍हारे मुंह से बार बार नकल रही है ।

अरे जै ठोका ठाकी करनी थी तो नेताजी कंधार में क्‍या अम्‍मा मर गयी थी या नानी पानी भर रही थी । जो दामादों की तरह आंतंकिस्‍तानीयों को लगुन फलदान के संग छोड़ आये थे । बाप ने मारी मेंढ़की बेटा तीरन्‍दाज, क्‍या यार नेताजी देश के स्‍वतंत्रता संग्राम में तुम कहीं नहीं दीखे, अब पकी पकाई खाने को जीभ लपका मार रही है, कसाब के मामले में भी पकी पकाई के लिये लपक मार रहे हो । हम संसद में होते तो कहते शेम शेम शेम । राजनीति का कैसा गेम, शेम शेम शेम

आजाद देश पर हुकूमती के लिये फड़फड़ाना आसान है, और पकड़े पकड़ाये कसाब के लिये नसीहत देना भी आसान है मगर देश आजाद कैसे होता है ये तो वे ही बता सकेगें जिन्‍होंने अपने लहू से भारत की आजादी का इतिहास लिखा और अपनी पीड़ाओं के साये में सुखी जीवन के सपने त्‍याग कर फांसी और गोलीओं का चुम्‍बन लिया, कंधार जाकर दामादों की तरह खुख्‍वार आतंकिस्‍तानीयों को मय लगुन फलदान नहीं जाकर छोड़ा बल्कि उन्‍हीं के दरबार में उन्‍हीं की ऑंख में ऑंख डाल कर आँख निकाल लीं और टेंटुये में हाथ डालकर पेट में से आंतें खींच लीं ।

मुम्‍बई में आतंकिस्‍तानीयों को जो हश्र झेलना पड़ा, अगर यह अंजाम उन्‍हें कंधार में देखने को मिलता तो आज मुम्‍बई तक आने का हौसला नहीं उफान मारता, कंधार में हम आतंकिस्‍तानी भून देते तो मुम्‍बई में उने चरण कमल नहीं पड़ते । कंधार में हम कायर हुये तो मुम्‍बई तक आतंकिस्‍तान चढ़ बैठा । हमारी सेना (असली सेना) ने अपने वीर सैनिकों की जान देकर जिन खुंख्‍वार आतंकिस्‍तानीयों को पकड़ा था हमारे कायर और नाकारा लुगमहरे नेता उन्‍हें कंधार छोड़ कर आये, तब नेता जी काहे नहीं बोले कि ऐसा कर दो वैसा कर दो ।

मुम्‍बई में हमने 200 आदमी की कुर्बानी दी है तब एक जिन्‍दा आतंकिस्‍तानी हाथ आया है, अब इसके कर्म कुकर्म का हिसाब करने का वक्‍त आया है तो नेताजी बोलते हैं कि ठोक काहे नहीं देते । नेताजी ठोका ठोकी कंधार में करना । देश पे बोलने और देश को नसीहत देने या रास्‍ता दिखाने का हक तो कंधार में अपने दामादों के साथ ही छोड़ आये हो ।

भारत के इतिहास की वह शर्मनाक घटनायें जिन्‍हें काले पन्‍नों पर उकेरा जायेगा उसमें कंधार, संसद और मुम्‍बई मे हमला खास होंगें ।

ऑंख में पानी हो तो एक बार शर्मनाक कृत्‍य कर राजपूत आत्‍महत्‍या कर लेता है सारी कौम को नीचा दिखाने के बाद भी अगर वह यह कहे कि मौका पड़ा तो फिर ऐसा करूंगा, ऐसे साले को तो खड़े खड़े भून देना चाहिये । कसाब से ज्‍यादा खतरनाक तो ये नेता है जो, आंतकिस्‍तानीयों के हौसले बढ़ाने का स्‍टेटमेण्‍ट देकर उन्‍हें छपा छपाया इन्विटेशन कार्ड दे रहा है । और कह रहा है, यानि रास्‍ता दिखा रहा है कि आओ मेरे प्‍यारे दामादो और फिर कंधार चलो, मेरी सरकार आयेगी तो फिर तुम्‍हें लगुन फलदान देकर सकुशल विदा करूंगा । ये नेता अफीम वफीम खाता है क्‍या । पता नहीं भारत सरकार इसे गोली क्‍यों नहीं मरवा रही । कुत्‍ता पागल तो गोली और नेता पागल तो ...........।

हवालात में बन्‍द कसाब पे हवा और लात घुमाने वाले नेता जी अकल अड्डे पर रखो नहीं तो ठोक के कसाब के संग ही आतंकिस्‍तान भिजवा दिये जाओगे ।

अब नेता जी बोले कि चलो मान लिया कि हम कायर है पर यार ये अंतुले काहे को कह रहा है कि करकरे को हमने मारा, आतंकिस्‍तानीयों ने नहीं मारा । हम फिर गुस्‍साये, भरे भराये तो बैठे ही थे और अपनी जिह्वा रूपी तोप से फिर गोलों की बौछार शुरू की, और उल्‍टे नेता जी से ही पूछ लिया, यार ये घटना उस रात काहे घटी जब सबेरे पूरी स्‍टेट में वोट डलने थे, उसके बाद दो स्‍टेट में और वोट डलने थे, इस घटना का फायदा किसे मिलता । दूजी बात ये कि एटीएस वाले वे ही क्‍यों मरे जो प्रज्ञा भारती काण्‍ड देख रहे थे (चुन चुन कर ) ये संयोग नहीं हो सकता ( इसके बाद नेता जी के कुछ पालतू ब्‍लागर्स ने लिखा कि साला करकरे हरामी मारा गया, ये शहीद नहीं था एक आम आदमी था करकरे नाम का एक साधारण आदमी मारा गया, साले करकरे ने साधू संतों (प्रज्ञा भारती) से पंगा लिया और निबट गया । (इण्‍टरनेट पर लगभग आधा सैकड़ा ब्‍लाग छद्म नाम से बना कर एक ही मैटर कापी पेस्‍ट किया गया था )

तीजी बात ये कि यार नेता जी शुरू से ही तुम्‍हारे आचरण आतंकिस्‍तानी रहे हैं , अफजल को फांसी की डिमाण्‍ड कम से कम वो नहीं कर सकता जो आंतकवादीयों को दामाद की तरह कंधार में लगुन फलदान देकर आया हो । या जिन्‍ना की मजार पर माथा पटक कर रिरियाया हो ।

नेता जी हमने दो सौ निर्दोष मासूमों का रक्‍त देखा है, लहू खौल जाता है और ऐसे में तुम्‍हारा सुर तुम्‍हारी सूरत सब की सब काल बराबर नजर आती है । अच्‍छा हो कसाब का फैसला उन पर छोड़ो जिन्‍होंने उसे पकड़ा है । अपनी नेतिया टांय टांय बन्‍द रखो तो अच्‍छा है, बोलने का हक कंधार में जो छोड़ आये हो ।